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दुनिया पर तेल संकट का खतरा गहराया, भारत के पास है कितना तेल भंडार ?

अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने एक बार फिर वैश्विक ऊर्जा बाजार की चिंता बढ़ा दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयान के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखने को मिली। ब्रेंट क्रूड का भाव करीब 6 फीसदी बढ़कर 78 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया।

ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ हुआ समझौता अब खत्म हो चुका है, हालांकि बातचीत के रास्ते खुले रहने की बात भी कही। इस बीच अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य टकराव की खबरों ने दुनिया का ध्यान रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण हुर्मुज जलडमरूमध्य की ओर खींच दिया है।

दुनिया के बड़े हिस्से का तेल और गैस व्यापार हुर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। ऐसे में यहां किसी भी तरह की रुकावट वैश्विक सप्लाई चेन को प्रभावित कर सकती है और तेल की कीमतों में अचानक बढ़ोतरी हो सकती है।

हाल ही में हुर्मुज से गुजरने वाले तीन व्यापारिक जहाजों पर हमलों की खबरों के बाद तनाव और बढ़ गया। अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने कार्रवाई की जानकारी दी, जबकि ईरानी मीडिया ने भी कई इलाकों में धमाकों की आवाजें सुनाई देने की खबर दी।

तेल संकट की स्थिति में भारत की तैयारी पर भी नजरें टिकी हुई हैं। रिपोर्टों के अनुसार, भारत ने हाल के महीनों में बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात किया, जिससे देश का तेल भंडार बढ़ा है।

बताया गया है कि भारत के कमर्शियल स्टोरेज और रिफाइनरियों में मौजूद कच्चे तेल का कुल स्टॉक लगभग 10.4 करोड़ बैरल तक पहुंच गया था। भारत प्रतिदिन करीब 50 लाख बैरल कच्चे तेल की खपत करता है।

इसके अलावा भारत के रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारों में भी कच्चा तेल सुरक्षित रखा जाता है। विशाखापत्तनम, मैंगलोर और पादुर स्थित भंडारण केंद्रों में लाखों टन तेल जमा है, जो आपात स्थिति में देश की जरूरतों को पूरा करने में मदद कर सकता है।

मध्य पूर्व में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच यूरोपीय संघ विमानन सुरक्षा एजेंसी ने एयरलाइंस को ईरान और इराक के हवाई क्षेत्र से बचने की सलाह दी है। एजेंसी ने सुरक्षा कारणों से अपनी एडवाइजरी जारी रखते हुए कहा है कि क्षेत्र में आगे सैन्य गतिविधियों का खतरा बना हुआ है।

अमेरिका-ईरान तनाव के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हुर्मुज जलडमरूमध्य प्रभावित होगा और इसका असर वैश्विक तेल बाजार पर कितना पड़ेगा। अगर स्थिति बिगड़ती है, तो भारत समेत कई तेल आयातक देशों के लिए कीमतें और सप्लाई दोनों बड़ी चुनौती बन सकती हैं।

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