वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मंडरा रहा क़र्ज़ और ऊर्जा संकट का ख़तरा: फाइनेंशियल टाइम्स
ब्रिटिश अख़बार फाइनेंशियल टाइम्स ने अपनी एक रिपोर्ट में वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने उभर रहे कई चिंताजनक संकेतों का खुलासा किया है। रिपोर्ट के अनुसार, मज़बूत आर्थिक वृद्धि के बावजूद संप्रभु ऋण बाजारों में उथल-पुथल और ऊर्जा की कीमतों में आए झटके वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चुनौतियाँ पैदा कर रहे हैं।
ब्रुकिंग्स-फाइनेंशियल टाइम्स के वैश्विक आर्थिक सुधार सूचकांक (TIGER) के नवीनतम विश्लेषण के मुताबिक, अमेरिका, चीन और भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में आर्थिक गतिविधियाँ ईंधन की बढ़ती क़ीमतों के बावजूद मज़बूत बनी हुई हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के क्षेत्र में बढ़ता निवेश भी आर्थिक वृद्धि को सहारा दे रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था कई झटकों से उबरकर मजबूत विकास की ओर बढ़ रही है, लेकिन इसके पीछे कई जोखिम छिपे हैं।
कॉर्नेल विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन के वरिष्ठ फेलो ईश्वर प्रसाद के अनुसार, लगातार बनी मुद्रास्फीति और सरकारी खर्च में बढ़ोतरी के कारण नीति-निर्माताओं के पास आर्थिक चुनौतियों से निपटने की गुंजाइश कम होती जा रही है। सरकारी कर्ज बढ़ने से बॉन्ड पर प्रतिफल और उधार लेने की लागत भी बढ़ रही है, जिससे निजी क्षेत्र की मांग प्रभावित हो रही है।
रिपोर्ट के मुताबिक, फरवरी में ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिकी नेतृत्व वाले हमले के बाद तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुँच गई थीं। इससे मुद्रास्फीति बढ़ी, हालांकि रणनीतिक तेल भंडार से आपूर्ति जारी करने के कारण कंपनियों और परिवारों पर इसका कुछ असर कम हुआ। अमेरिका में पेट्रोल की महँगाई रिपब्लिकन पार्टी के लिए मध्यावधि चुनावों से पहले राजनीतिक चुनौती भी बन रही है।
देशों के आर्थिक प्रदर्शन में बड़ा अंतर दिखाई दे रहा है। अमेरिका और सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र वैश्विक वृद्धि के प्रमुख चालक हैं। जर्मनी में बुनियादी ढाँचे और रक्षा पर कर्ज से वित्तपोषित सरकारी खर्च ने आर्थिक प्रदर्शन को सहारा दिया है, जबकि फ्रांस आर्थिक ठहराव और कर्ज की स्थिरता को लेकर चिंताओं से जूझ रहा है। भारत की वृद्धि दर 7.1 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जबकि चीन घरेलू खर्च में सुस्ती के बीच बाहरी मांग पर निर्भर है। गरीब तेल और गैस आयातक देश ऊर्जा संकट से सबसे अधिक प्रभावित हो सकते हैं।
इस बीच, अमेरिका, जापान, ब्रिटेन और फ्रांस सहित कई अर्थव्यवस्थाओं में सरकारी बॉन्ड की बिकवाली से उधारी की लागत दशकों के उच्चतम स्तरों तक पहुँच गई है। अमेरिका में 10 वर्षीय बॉन्ड का प्रतिफल 2002 के बाद, ब्रिटेन में 2007 के बाद और जापान में इस सदी के उच्चतम स्तर पर पहुँचा है।
रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि बढ़ते क़र्ज़ और सीमित वित्तीय संसाधनों के बीच सरकारों को श्रम, वस्तुओं एवं सेवाओं और वित्तीय बाजारों में संरचनात्मक सुधार करने होंगे। उत्पादकता बढ़ाना ही दीर्घकाल में वैश्विक आर्थिक वृद्धि को टिकाऊ बनाने का प्रमुख रास्ता है।

