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अमेरिका ने इराक़ी मंत्रिमंडल के शेष 9 मंत्रियों के चयन के गठन में दबाव बनाया

अमेरिका ने इराक़ी मंत्रिमंडल के शेष 9 मंत्रियों के चयन के गठन में दबाव बनाया

इराक़ के एक सांसद ने दावा किया है कि अमेरिका ने प्रधानमंत्री अली अल-ज़ैदी की सरकार के मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने वाले शेष 9 मंत्रियों के चयन को लेकर अपना दबाव और बढ़ा दिया है।

इराक़ के “कोऑर्डिनेशन फ्रेमवर्क” (समन्वय ढांचा) के सदस्य अली अल-ज़ुबैदी ने कहा कि जिस प्रकार अमेरिका ने प्रधानमंत्री के चयन के समय नूरी अल-मालिकी की उम्मीदवारी का विरोध करते हुए इराक़ पर अधिकतम दबाव बनाया था, उसी प्रकार अब भी वह अली अल-ज़ैदी सरकार को मंत्रियों के स्वतंत्र चयन की अनुमति नहीं दे रहा है।

अल-ज़ुबैदी के अनुसार, अमेरिका इराक़ की राजनीतिक प्रक्रिया और सरकार के गठन को अपने हितों के अनुरूप प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है तथा मंत्रिमंडल के गठन में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हस्तक्षेप जारी रखे हुए है।

इसी संदर्भ में एक प्रश्न यह भी उठता है कि कुछ राजनीतिक विश्लेषक टीवी बहसों में लगातार ईरान पर यह आरोप लगाते रहे हैं कि वह लेबनान के आंतरिक मामलों में दखलअंदाज़ी कर रहा है। उनका तर्क है कि यदि लेबनान की सरकार इस्राईल के साथ समझौता करना चाहती है, तो ईरान उसमें बाधा क्यों डाल रहा है?

ऐसे में सवाल यह उठता है कि वही राजनीतिक विश्लेषक, जिन्हें आलोचक इस्राईल का समर्थक बताते हैं, अब अमेरिका से यह प्रश्न क्यों नहीं करते कि वह इराक़ के आंतरिक मामलों और सरकार के गठन में हस्तक्षेप क्यों कर रहा है?

क्या अमेरिका यह तय करेगा कि इराक़ की सरकार में कौन मंत्री बनेगा और कौन नहीं?

क्या किसी संप्रभु देश की सरकार के गठन को इस प्रकार प्रभावित करने का प्रयास उसकी खुली दादागीरी नहीं माना जाएगा?

जहाँ तक लेबनान का प्रश्न है, ईरान का कहना है कि उसने केवल लेबनान की जनता के समर्थन में इस्राईली हमलों का विरोध किया है। ईरान का यह भी कहना है कि लेबनान की सरकार को अपने नागरिकों की सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेने चाहिए। वहीं राष्ट्रपति जोसफ़ औन की सरकार पर यह आरोप लगाया जा रहा है कि वह लेबनान को इस्राईल के प्रभाव के दायरे में ले जाना चाहती है, जिसका वहाँ की जनता विरोध कर रही है।

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