तेहरान : ईरान के साथ करीब छह महीने तक चले संघर्ष में अमेरिका को अपने सबसे अहम निगरानी और हमले वाले ड्रोन बेड़े को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा है। वॉशिंगटन पोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, युद्ध के दौरान अमेरिका के कम से कम 45 MQ-9 रीपर ड्रोन नष्ट या दुर्घटनाग्रस्त हुए। इनमें से कई ड्रोन हुर्मुज़ जलडमरूमध्य के आसपास ऑपरेशन के दौरान खोए गए।
युद्ध शुरू होने से पहले अमेरिकी सेना के पास कुल 185 MQ-9 रीपर मौजूद थे। ऐसे में 45 ड्रोन का नुकसान उसके कुल बेड़े का लगभग एक चौथाई बैठता है। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि इन ड्रोन और उनसे जुड़े उपकरणों की कीमत के आधार पर अमेरिका को 1.3 अरब डॉलर से ज्यादा का नुकसान हुआ है।
रिपोर्ट के अनुसार, 28 फरवरी को युद्ध शुरू होने के समय अमेरिकी सेना के पास 185 MQ-9 रीपर ड्रोन थे। इनमें 165 ड्रोन अमेरिकी एयर फोर्स और 20 मरीन कॉर्प्स के पास थे।
दिलचस्प बात यह है कि मरीन कॉर्प्स का कोई भी रीपर इस संघर्ष में दुर्घटनाग्रस्त नहीं हुआ। इसकी एक वजह यह बताई गई है कि मरीन कॉर्प्स के रीपर आम तौर पर एशिया-प्रशांत क्षेत्र में तैनात रहते हैं और हुर्मुज़ के आसपास चल रहे अभियानों में उनकी मौजूदगी सीमित थी।
अमेरिकी रीपर ड्रोन के लिए हुर्मुज़ जलडमरूमध्य का इलाका बेहद जोखिम भरा साबित हुआ। रिपोर्ट के मुताबिक, कई ड्रोन उस समय मार गिराए गए जब वे हुर्मुज़ के ऊपर निगरानी और सैन्य अभियानों में लगे हुए थे।
अमेरिकी अधिकारियों के लिए ईरानी हमलों की सटीकता खास तौर पर चौंकाने वाली रही। जिस इलाके में अमेरिका अपने ड्रोन के जरिए निगरानी और ऑपरेशन चला रहा था, वहीं ईरान की एयर डिफेंस क्षमता ने अमेरिकी ड्रोन बेड़े को काफी नुकसान पहुंचाया।
हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि सभी 45 रीपर सीधे ईरानी हमले में नष्ट हुए। एक अमेरिकी अधिकारी के अनुसार, कुछ ड्रोन अपने ऑपरेटरों के साथ कम्युनिकेशन लिंक टूटने के बाद दुर्घटनाग्रस्त हुए। यानी कुल नुकसान में दुश्मन की कार्रवाई के साथ-साथ तकनीकी और ऑपरेशनल कारण भी शामिल रहे।
MQ-9 रीपर कोई सामान्य निगरानी ड्रोन नहीं है। इसमें अत्याधुनिक सेंसर, संचार प्रणाली और हथियार लगाए जा सकते हैं। इसके कॉन्फिगरेशन के आधार पर एक रीपर की कीमत करीब 3 से 5 करोड़ डॉलर तक बताई जाती है। भारतीय मुद्रा में यह रकम लगभग 286 करोड़ से 500 करोड़ रुपये के आसपास बैठती है।
अगर ड्रोन के साथ ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन, सैटेलाइट कम्युनिकेशन सिस्टम, अतिरिक्त उपकरण और हथियारों की पूरी व्यवस्था को शामिल किया जाए, तो वास्तविक लागत और भी बढ़ सकती है।
इसी वजह से 45 रीपर खोना अमेरिका के लिए केवल सैन्य क्षमता में कमी नहीं है, बल्कि एक बड़ा वित्तीय झटका भी है। वॉशिंगटन पोस्ट के अनुमान के मुताबिक कुल नुकसान 1.3 अरब डॉलर से अधिक हो सकता है। हालांकि, पेंटागन ने रीपर ड्रोन के नुकसान से संबंधित रिपोर्ट पर टिप्पणी करने से इनकार किया है।
MQ-9 रीपर अमेरिकी कंपनी जनरल एटॉमिक्स द्वारा विकसित एक रिमोट-कंट्रोल्ड मानवरहित विमान है। इसे अमेरिकी सेना में वर्ष 2007 में शामिल किया गया था। इसके बाद से अमेरिका ने अफगानिस्तान, इराक और पश्चिम एशिया समेत कई सैन्य अभियानों में इसका इस्तेमाल किया है।
रीपर की सबसे बड़ी ताकत इसकी लंबी अवधि तक हवा में रहकर निगरानी करने की क्षमता है। यह लंबे समय तक किसी इलाके पर नजर रख सकता है और जरूरत पड़ने पर सटीक हमला भी कर सकता है।
इसी वजह से अमेरिकी सैन्य अभियानों में रीपर की भूमिका केवल हमला करने तक सीमित नहीं रही। यह खुफिया जानकारी जुटाने, दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने, लक्ष्य की पहचान करने और जरूरत पड़ने पर हथियार इस्तेमाल करने वाली एक महत्वपूर्ण कड़ी है।
रीपर ड्रोन का भारी नुकसान अमेरिका के सामने खड़ी बड़ी सैन्य चुनौती का सिर्फ एक हिस्सा है। ईरान के खिलाफ लंबे संघर्ष के दौरान अमेरिका के सटीक हमलों में इस्तेमाल होने वाले मिसाइलों और अन्य हथियारों के भंडार पर भी दबाव बढ़ने की खबरें सामने आई हैं।
अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन अब युद्ध से जुड़े खर्चों और हथियारों के भंडार को दोबारा मजबूत करने के लिए कांग्रेस से करीब 67 अरब डॉलर के अतिरिक्त युद्ध वित्तपोषण पैकेज की मांग कर रहा है।
अमेरिकी अधिकारियों की चिंता सिर्फ मौजूदा युद्ध के खर्च तक सीमित नहीं है। उनका आकलन है कि इस्तेमाल किए गए गोला-बारूद, मिसाइल इंटरसेप्टर और ड्रोन के भंडार को फिर से भरने में कई साल लग सकते हैं।
हुर्मुज़ जैसे संवेदनशील इलाके में इतने बड़े पैमाने पर रीपर ड्रोन का नुकसान अमेरिका के लिए रणनीतिक चिंता का विषय है। रीपर लंबी दूरी की निगरानी और सटीक हमले के अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में बड़ी संख्या में इनकी कमी का असर भविष्य के अभियानों की क्षमता पर पड़ सकता है।
दूसरी ओर, ईरान की ओर से अमेरिकी ड्रोन को निशाना बनाए जाने की क्षमता ने यह भी दिखाया है कि हुर्मुज़ के आसपास अमेरिकी हवाई अभियानों के लिए जोखिम कितना बढ़ गया है।
कुल मिलाकर, करीब छह महीने चले इस संघर्ष में 45 MQ-9 रीपर का नुकसान अमेरिका के लिए मानव रहित युद्धक क्षमता, खुफिया निगरानी और रक्षा बजट—तीनों मोर्चों पर बड़ा झटका माना जा रहा है। इसके साथ ही हथियारों के घटते भंडार को दोबारा भरने की चुनौती आने वाले वर्षों में अमेरिकी सैन्य रणनीति पर असर डाल सकती है।

