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होर्मुज़ मुद्दे पर सऊदी पर अमेरिकी हथियारों का दबाव: वॉल स्ट्रीट जर्नल

 होर्मुज़ मुद्दे पर सऊदी पर अमेरिकी हथियारों का दबाव: वॉल स्ट्रीट जर्नल

अमेरिकी अख़बार वॉल स्ट्रीट जर्नल ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि जब सऊदी अरब ने अमेरिका की कथित “प्रोजेक्ट फ़्रीडम” योजना के लिए अपने सैन्य अड्डों और हवाई क्षेत्र के इस्तेमाल की अनुमति देने से इनकार कर दिया, तो अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने सऊदी नेतृत्व को चेतावनी दी कि अमेरिका उसे ड्रोन और मिसाइलों को रोकने वाले इंटरसेप्टर सिस्टम की आपूर्ति बंद कर सकता है।

रिपोर्ट के अनुसार,

अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि वॉशिंगटन अब सऊदी अरब में अपनी सैन्य उपस्थिति कम करने पर भी विचार कर रहा है।

स्ट्रीट जर्नल का कहना है कि इस तरह की अमेरिकी धमकियाँ, जिनकी जानकारी पहले सार्वजनिक नहीं हुई थी, ने अमेरिका और सऊदी अरब के बीच दशकों पुराने सुरक्षा संबंधों में अब तक की सबसे बड़ी दरार पैदा कर दी है। यही संबंध लंबे समय से फ़ारस की खाड़ी की सुरक्षा व्यवस्था की रीढ़ माने जाते रहे हैं।

युद्ध के दौरान ट्रंप और मोहम्मद बिन सलमान के बीच तीखी तनातनी: न्यूयॉर्क टाइम्स

अमेरिकी अख़बार न्यूयॉर्क टाइम्स ने खुलासा किया है कि हालिया युद्ध के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) और मोहम्मद बिन सलमान (Mohammed bin Salman) के बीच कई बार तनावपूर्ण टेलीफोन वार्ताएँ हुईं।

रिपोर्ट के मुताबिक, जब अमेरिका ने “प्रोजेक्ट फ़्रीडम” के तहत होर्मुज़ जलडमरूमध्य को जहाज़ों की आवाजाही के लिए खोलने की योजना बनाई, तब सऊदी अधिकारियों ने स्पष्ट कर दिया कि वे ईरान के खिलाफ किसी भी सैन्य अभियान के लिए अपने हवाई क्षेत्र के उपयोग की अनुमति नहीं देंगे।

न्यूयॉर्क टाइम्स का दावा है कि ट्रंप प्रशासन ने इस योजना के संबंध में पहले से सऊदी अरब से कोई औपचारिक परामर्श नहीं किया था।

इसी कारण वॉशिंगटन और सऊदी युवराज मोहम्मद बिन सलमान के बीच कई आपातकालीन और तनावपूर्ण फोन कॉल हुए।

अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, 4 मई (ऑपरेशन शुरू होने के पहले दिन) और उसके बाद के दो दिनों में ट्रंप ने स्वयं कई बार मोहम्मद बिन सलमान से बात की।

इसके अलावा अमेरिकी उपराष्ट्रपति J. D. Vance, मध्य पूर्व मामलों के लिए अमेरिकी विशेष दूत Steve Witkoff तथा ट्रंप के दामाद Jared Kushner ने भी सऊदी नेतृत्व से अलग-अलग संपर्क किया।

रिपोर्ट के अनुसार, मोहम्मद बिन सलमान अपने रुख पर कायम रहे क्योंकि उन्हें आशंका थी कि यदि सऊदी अरब ने अमेरिका का साथ दिया तो ईरान की ओर से कहीं अधिक गंभीर जवाबी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।

अंततः ट्रंप प्रशासन को “प्रोजेक्ट फ़्रीडम” शुरू होने के 48 घंटे से भी कम समय के भीतर इस अभियान को पूरी तरह रोकना पड़ा।

वॉशिंगटन स्थित गल्फ स्टेट्स इंस्टीट्यूट के शोधकर्ता Hussein Ibish ने कहा, “सऊदी नेतृत्व का ट्रंप प्रशासन पर भरोसा कम हो चुका था। उन्हें लगता था कि यदि उन्होंने अमेरिका को अपना हवाई क्षेत्र इस्तेमाल करने दिया, तो ईरान की ओर से कहीं अधिक कड़े हमलों का सामना करना पड़ेगा।”

न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, यह घटनाक्रम अमेरिका और सऊदी अरब के बीच क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर बढ़ते मतभेदों को दर्शाता है। अख़बार का कहना है कि सऊदी नेतृत्व अब अमेरिका को पहले की तुलना में कम भरोसेमंद और कुछ मामलों में खाड़ी के अरब देशों की सुरक्षा के लिए संभावित जोखिम के रूप में भी देखने लगा है।

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