इस्राईल को लेबनान से बाहर निकालने का एकमात्र रास्ता ईरान-अमेरिका समझौते का क्रियान्वयन है:नबीह बेरी
लेबनान की सरकार ने देश के कब्जे वाले क्षेत्रों से इस्राईल की वापसी के नाम पर कई महत्वपूर्ण रियायतें दी हैं, लेकिन लेबनानी संसद के अध्यक्ष नबीह बेरी का कहना है कि यह समझौता किसी भी परिणाम तक नहीं पहुंचेगा।
नबीह बेरी ने कहा कि इस्राईल के साथ प्रत्यक्ष वार्ता के दौरान लेबनान सरकार ने अपनी सभी “रेड लाइन” पार कर दीं। इनमें इस्राईल की लेबनान के क़ब्ज़े वाले क्षेत्रों से पूर्ण वापसी, उसके हमलों का स्थायी अंत, क़ैदियों की रिहाई तथा दक्षिणी लेबनान के विस्थापित नागरिकों की सुरक्षित घर वापसी जैसी मूलभूत शर्तें शामिल थीं।
उन्होंने वॉशिंगटन में हुए इस समझौते को “थोपा गया समझौता” बताया और कहा कि यह 17 मई 1983 के समझौते से भी दस गुना अधिक ख़राब है। उल्लेखनीय है कि 1983 का समझौता लेबनान के गृहयुद्ध और 1982 में बेरूत की घेराबंदी के दौरान लेबनान और इस्राईल के बीच हुआ था। उस समझौते में इस्राईली सेना की बेरूत से वापसी तथा दोनों पक्षों के संबंधों को सामान्य बनाने का मार्ग प्रशस्त किया गया था।
बेरी ने चेतावनी दी कि इस समझौते के विरोध में किसी भी प्रकार का सड़क आंदोलन या ऐसा क़दम नहीं उठाया जाना चाहिए, जिसका फ़ायदा उठाकर देश को अराजकता और गृहयुद्ध की ओर धकेला जा सके।
उन्होंने कहा कि, इस्राईल के साथ वार्ता किसी भी क़ीमत पर ऐसी प्रक्रिया नहीं बननी चाहिए, जिससे उसे वे राजनीतिक लाभ मिल जाएं जिन्हें वह युद्ध के मैदान में हासिल नहीं कर सका।
बेरी के अनुसार, इस वार्ता ने प्राथमिकताओं का क्रम ही बदल दिया है। अब इस्राईल की वापसी को राजनीतिक और सुरक्षा संबंधी शर्तों से जोड़ दिया गया है, जिनके पूरा होने में वर्षों लग सकते हैं। साथ ही ऐसी कोई ठोस गारंटी भी नहीं है, जो इस्राईल को अपने वादों का पालन करने के लिए बाध्य करे।
उन्होंने कहा कि इस समझौते का सबसे बड़ा ख़तरा केवल इसकी राजनीतिक शर्तें नहीं हैं, बल्कि यह है कि इससे लेबनान के भीतर आंतरिक विभाजन बढ़ सकता है और देश एक बार फिर गृहयुद्ध की ओर बढ़ सकता है।
नबीह बेरी ने यह भी कहा कि, उनके नेतृत्व वाले अमल आंदोलन के मंत्री सरकार की उन सभी बैठकों में हिस्सा लेंगे, जिनमें इस समझौते पर चर्चा होगी, और वहां इसका विरोध करेंगे। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “यह समझौता लागू नहीं होगा और न ही अपने उद्देश्य में सफल होगा।”
बेरी का मानना है कि ईरान और अमेरिका के बीच हुआ समझौता ही ऐसा एकमात्र ढांचा है, जो शक्ति-संतुलन स्थापित कर सकता है और इस्राईल को अपनी प्रतिबद्धताओं का पालन करने के लिए मजबूर कर सकता है।
उन्होंने अंत में कहा कि यदि लेबनान के मुद्दे को इस प्रक्रिया से अलग कर अमेरिका और इस्राईल की शर्तों के आधार पर एकतरफा वार्ता की जाती है, तो इससे केवल इस्राईली क़ब्ज़ा लंबा खिंचेगा, दुश्मन को ज़मीनी हकीकत बदलने का समय मिलेगा और लेबनान को कोई वास्तविक सुरक्षा या गारंटी प्राप्त नहीं होगी।

