Site icon ISCPress

ग़ाज़ा में मलबे में दबी 100 लाशें बरामद, सिविल डिफेंस का दूसरा चरण पूरा

ग़ाज़ा में मलबे में दबी 100 लाशें बरामद, सिविल डिफेंस का दूसरा चरण पूरा

ग़ाज़ा शहर के लोग 6 सितंबर को सामूहिक अंतिम संस्कार के लिए एकत्र हुए, ताकि लगभग 100 फ़िलिस्तीनियों को अंतिम विदाई दी जा सके। इन लोगों के शव और मानव अवशेष इस्राईली हमलों में तबाह हुए घरों के मलबे से बरामद किए गए थे। यह बरामदगी ग़ाज़ा के सिविल डिफेंस के दूसरे चरण का हिस्सा थी, जो पीड़ितों की मौत के दो साल से अधिक समय बाद पूरा हुआ। यह उन रिश्तेदारों के लिए बेहद दर्दनाक क्षण था, जो लंबे समय से अपने प्रियजनों के शवों तक नहीं पहुंच पाए थे।

तबाह हो चुके ज़ैतून इलाके में इमाम शाफ़ई मस्जिद के बाहर इन अवशेषों को सफ़ेद कफ़न में लपेटकर रखा गया था। शोक मनाने वालों ने मोमबत्तियां जलाईं, फूल चढ़ाए और बच्चों, महिलाओं, पुरुषों तथा बुज़ुर्गों की धुंधली तस्वीरें हाथों में थामे रखीं। कई परिवार अस्थायी पट्टिकाओं पर लिखे नाम पढ़ते हुए फूट-फूटकर रो पड़े। वर्षों की दर्दनाक अनिश्चितता के बाद वे आखिरकार अपने प्रियजनों के लिए उचित अंतिम संस्कार की रस्में पूरी कर पा रहे थे।

ग़ौरतलब है कि बरामदगी के दूसरे चरण में पूरी तरह तबाह हुए 147 घरों की पहचान की गई है। अनुमान है कि इन घरों के मलबे के नीचे लगभग 1,072 शव दबे हुए हैं। पहले चरण के दौरान बचाव दलों ने शहर भर में 54 स्थानों से लगभग 333 शव और मानव अवशेष बरामद किए थे। सिविल डिफेंस की टीम सीमित भारी मशीनरी और लगातार जारी हमलों के खतरे के बीच काम कर रही है। उसने इस प्रक्रिया को “बेहद धीमा” बताया, लेकिन साथ ही कहा कि सामूहिक गरिमा बनाए रखने के लिए यह काम बेहद ज़रूरी है।

अक्टूबर 2023 में ग़ाज़ा पर इस्राईल के हमलों के शुरू होने के बाद से, फ़िलिस्तीनी स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार कम से कम 73,651 फ़िलिस्तीनी मारे गए हैं और 174,575 घायल हुए हैं। माना जा रहा है कि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है, क्योंकि हज़ारों लोग अब भी मलबे के नीचे लापता हैं। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने बार-बार नागरिक बुनियादी ढांचे की बड़े पैमाने पर हुई तबाही की स्वतंत्र जांच की मांग की है।

शहीदों के परिवारों के लिए यह सामूहिक अंतिम संस्कार एक अंत और एक शुरुआत—दोनों था। यह वर्षों से चले आ रहे दर्द के बाद सही तरीके से शोक मनाने का अवसर था, लेकिन साथ ही उस निर्मम हिंसा की एक स्पष्ट याद भी, जिसने ग़ाज़ा के जीवन के हर पहलू को तहस-नहस कर दिया है। जैसे ही मस्जिद के ऊपर सूरज डूबा, शोक मनाने वालों की सिसकियां दूर से आती ड्रोन की आवाज़ के साथ घुल गईं। यह दृश्य उन लोगों की बरामदगी और आगे होने वाली तबाही के लगातार बने रहने वाले खतरे के बीच मौजूद एक बेहद नाज़ुक ठहराव को उजागर कर रहा था।

Exit mobile version