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ट्रंप की प्राथमिकता तेहरान के साथ समझौता करना है: अमेरिकी विदेश मंत्री

ट्रंप की प्राथमिकता तेहरान के साथ समझौता करना है: अमेरिकी विदेश मंत्री

अमेरिका के विदेश मंत्री ने आज (शनिवार) म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन के दौरान ब्लूमबर्ग से बातचीत में दावा किया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का पसंदीदा विकल्प ईरान के साथ समझौते तक पहुंचना है। उन्होंने कहा, “अगर कल आयतुल्लाह ख़ामेनेई कहें कि वे ट्रंप से मिलना चाहते हैं, तो ट्रंप उनसे मुलाकात करेंगे।”

लेकिन सवाल यह है कि क्या यह पहल वास्तव में संवाद की ईमानदार कोशिश है, या फिर दबाव की पुरानी नीति का नया पैकेज?

रूबियो ने दावा किया कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को अमेरिकी सैन्य कार्रवाई से रोका गया। हालांकि इस दावे का कोई ठोस विवरण या अंतरराष्ट्रीय पुष्टि सामने नहीं आई। तेहरान लंबे समय से यह कहता आया है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है और अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण एजेंसियों के साथ वह सहयोग करता रहा है। ऐसे में बिना प्रमाण के सैन्य सफलता का दावा, अमेरिका की वही एकतरफा रणनीति दर्शाता है, जिसके तहत वह खुद को वैश्विक निर्णायक मानता है।

ईरान का पक्ष स्पष्ट रहा है कि दबाव, प्रतिबंध और सैन्य धमकियों के बीच कोई भी समझौता बराबरी का नहीं हो सकता। ट्रंप प्रशासन भले ही “नवीनीकरण और पुनर्जीवन” की नीति की बात करे, लेकिन इतिहास गवाह है कि वॉशिंगटन ने कई बार समझौतों से पीछे हटकर अंतरराष्ट्रीय भरोसे को कमजोर किया है। ऐसे में तेहरान स्वाभाविक रूप से सतर्क है।

अमेरिका यह कहता है कि वह अंतरराष्ट्रीय सहयोग खत्म नहीं करना चाहता, पर साथ ही “अकेले कदम उठाने” की बात भी दोहराता है। यही दोहरी नीति वैश्विक अस्थिरता की जड़ मानी जाती है। एक तरफ बातचीत का न्योता, दूसरी तरफ सैन्य विकल्प की खुली धमकी।

ईरान के समर्थकों का तर्क है कि अगर वास्तव में शांति और स्थिरता प्राथमिकता है, तो अमेरिका को पहले प्रतिबंधों और दबाव की नीति पर पुनर्विचार करना चाहिए। संवाद तभी सार्थक हो सकता है जब वह सम्मान और संप्रभुता के आधार पर हो, न कि ताकत के प्रदर्शन पर।

अंत में तस्वीर यही बनती है: अमेरिका बातचीत की मेज सजाता है, लेकिन कुर्सी के नीचे शक्ति का संतुलन अपने पक्ष में रखने की कोशिश भी करता है। तेहरान के लिए चुनौती यही है कि वह अपनी राष्ट्रीय स्वायत्तता से समझौता किए बिना कूटनीतिक रास्ता निकाले। कुल मिलाकर संदेश साफ था: ट्रंप प्रशासन ईरान के साथ समझौते को प्राथमिकता देता है, बातचीत के लिए दरवाज़ा खुला है, लेकिन साथ ही अमेरिकी शक्ति और सैन्य विकल्प को भी पूरी तरह खारिज नहीं किया गया है। राजनीति की दुनिया में इसे कहते हैं, हाथ में जैतून की डाली और जेब में हथौड़ा।

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