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यूएई ने हिज़्बुल्लाह से संबंध के आरोप में 21 व्यक्तियों और संस्थाओं को आतंकवाद सूची में डालने की घोषणा की

यूएई ने हिज़्बुल्लाह से संबंध के आरोप में 21 व्यक्तियों और संस्थाओं को आतंकवाद सूची में डालने की घोषणा की

संयुक्त अरब अमीरात ने एक बार फिर ऐसा कदम उठाया है जिसे क्षेत्रीय राजनीति में प्रतिरोधी ताक़तों के खिलाफ कार्रवाई के रूप में देखा जा रहा है। अबू धाबी सरकार ने हिज़्बुल्लाह लेबनान से कथित संबंध रखने वाले 21 व्यक्तियों और संस्थाओं को आतंकवाद सूची में डालने की घोषणा की है। यूएई का दावा है कि यह फैसला “आतंकवाद के वित्तपोषण को रोकने” और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करने के उद्देश्य से लिया गया है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि अमीरात स्वयं लंबे समय से पश्चिमी और ज़ायोनी नीतियों के अनुरूप काम करता रहा है।

अमीराती अधिकारियों ने आदेश दिया है कि देश की सभी वित्तीय और निगरानी संस्थाएं सूचीबद्ध लोगों और संस्थाओं से जुड़े हर प्रकार के आर्थिक और व्यापारिक संबंध की जांच करें तथा 24 घंटे के भीतर उनकी संपत्तियां फ्रीज़ कर दें। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम केवल आर्थिक दबाव बनाने के लिए नहीं, बल्कि क्षेत्र में प्रतिरोधी संगठनों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग करने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है।

इस अख़बार के अनुसार, रैपिड सपोर्ट फोर्सेज़ (RSF) के वे कमांडर, जिन पर नरसंहार जैसे अपराधों के आरोप हैं, संयुक्त अरब अमीरात को “सहायक खजाने” और अपनी तथा अपने परिवारों की भारी संपत्ति छिपाने के लिए एक सुरक्षित ठिकाने के रूप में इस्तेमाल करते हैं।

आलोचकों का कहना है कि जिस अमीरात पर स्वयं विभिन्न क्षेत्रीय संघर्षों में हस्तक्षेप, हथियारबंद गुटों को समर्थन और युद्धग्रस्त देशों में अस्थिरता फैलाने के आरोप लगते रहे हों, उसका आतंकवाद विरोधी दावे करना दोहरे मापदंड को दर्शाता है। कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में यह आरोप सामने आ चुका है कि सूडान की रैपिड सपोर्ट फोर्सेज़ (RSF) के कमांडरों ने, जिन पर युद्ध अपराध और नरसंहार जैसे गंभीर आरोप हैं, यूएई को अपनी संपत्ति और धन छिपाने के सुरक्षित केंद्र के रूप में इस्तेमाल किया।

विश्लेषकों के अनुसार, हिज़्बुल्लाह के खिलाफ यह नया कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब क्षेत्र में प्रतिरोधी धड़े इज़रायल और उसके सहयोगियों के विरुद्ध अधिक सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। इसलिए अमीरात की यह कार्रवाई केवल कानूनी या वित्तीय मामला नहीं, बल्कि मध्य पूर्व की बदलती राजनीतिक और सामरिक परिस्थितियों से जुड़ा एक बड़ा संदेश भी मानी जा रही है।

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