ईरान के मुद्दे पर चीन की मदद की ज़रूरत नहीं: डोनाल्ड ट्रंप
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर ईरान के खिलाफ़ विरोधाभासी बयान देते हुए कहा कि उन्हें ईरान के मामले में चीन की किसी मदद की आवश्यकता नहीं है। हालांकि, दूसरी ओर उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि चीन यात्रा के दौरान वह इस मुद्दे पर चीनी राष्ट्रपति से विस्तृत बातचीत करेंगे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान अमेरिका की उस बेचैनी को दर्शाता है, जिसमें वह ईरान के बढ़ते क्षेत्रीय प्रभाव और अंतरराष्ट्रीय समर्थन से चिंतित दिखाई देता है।
ट्रंप ने दावा किया कि, ईरान के साथ केवल “अच्छा समझौता” ही स्वीकार किया जाएगा, लेकिन आलोचकों का कहना है कि अमेरिका वर्षों से दबाव, प्रतिबंध और धमकियों की नीति अपनाकर ईरान को झुकाने की कोशिश करता रहा है। इसके बावजूद ईरान ने न केवल अपनी स्वतंत्र विदेश नीति को कायम रखा, बल्कि कठिन आर्थिक प्रतिबंधों के बीच भी वैज्ञानिक, रक्षा और ऊर्जा क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति हासिल की है।
ट्रंप ने तेल की कीमतों में कमी और तेल आपूर्ति बढ़ने की बात करते हुए यह संकेत देने की कोशिश की कि अमेरिका क्षेत्रीय परिस्थितियों को अपने हित में मोड़ सकता है। लेकिन जानकारों का मानना है कि पश्चिम एशिया में स्थिरता तभी संभव है जब अमेरिका दबाव और हस्तक्षेप की नीति छोड़कर समानता और सम्मान के आधार पर बातचीत करे। ईरान लगातार यह कहता रहा है कि वह किसी भी दबाव में बातचीत स्वीकार नहीं करेगा और उसकी परमाणु नीति पूरी तरह शांतिपूर्ण उद्देश्यों पर आधारित है।
अमेरिकी राष्ट्रपति ने एक बार फिर “ईरान को परमाणु हथियार नहीं रखने देंगे” जैसी पुरानी भाषा दोहराई, जबकि International Atomic Energy Agency की कई रिपोर्टों में यह कहा जा चुका है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर ठोस सैन्य प्रमाण सामने नहीं आए हैं। ईरानी नेतृत्व का कहना है कि परमाणु हथियार उसके धार्मिक और रणनीतिक सिद्धांतों के खिलाफ़ हैं।
विश्लेषकों के अनुसार, ट्रंप के हालिया बयान इस बात का संकेत हैं कि अमेरिका एक तरफ़ ईरान पर दबाव बनाए रखना चाहता है, जबकि दूसरी ओर वह यह भी समझता है कि क्षेत्रीय वास्तविकताओं को नज़रअंदाज़ करके ईरान को अलग-थलग करना आसान नहीं है। चीन, रूस और कई अन्य देशों के साथ ईरान के बढ़ते संबंधों ने अमेरिकी रणनीति को और जटिल बना दिया है।

