इज़रायल ने लेबनान के साथ वार्ता में फ्रांस की भागीदारी का विरोध किया
एक ज़ायोनी अधिकारी ने कहा है कि, अवैध इज़रायली शासन और लेबनान के बीच संभावित युद्ध-विराम समझौते पर होने वाली आगामी वार्ताओं से फ्रांस को बाहर रखा जाएगा। इस निर्णय के पीछे कारण यह बताया गया है कि फ्रांस ने ईरान के खिलाफ युद्ध में इज़रायल की क्षमता को सीमित करने की कोशिश की है, और साथ ही लेबनान सरकार की सहायता के लिए हिज़्बुल्लाह को निरस्त्र करने के संबंध में कोई ठोस कदम नहीं उठाया है।
हिब्रू अख़बार “जेरूसलम पोस्ट” ने उसी अधिकारी के हवाले से रिपोर्ट किया कि पिछले एक वर्ष के दौरान फ्रांस के रवैये के कारण इज़राइल अब उसे एक निष्पक्ष मध्यस्थ नहीं मानता।
इज़रायल द्वारा लेबनान के साथ होने वाली वार्ताओं से फ्रांस को बाहर रखने का फैसला कई सवाल खड़े करता है और इसे एकतरफा तथा पक्षपातपूर्ण कदम के रूप में देखा जा रहा है।
इज़रायल का यह आरोप कि फ्रांस उसकी सैन्य क्षमता को सीमित करना चाहता है, दरअसल उस कूटनीतिक प्रयास का हिस्सा बताया जा रहा है जिसका उद्देश्य क्षेत्र में शांति स्थापित करना और बड़े युद्ध को टालना है। लेकिन इज़रायल इस तरह के प्रयासों को नजरअंदाज कर अपनी आक्रामक नीतियों को जारी रखना चाहता है।
साथ ही, लेबनान और हिज़्बुल्लाह के मुद्दे पर फ्रांस पर आरोप लगाना भी कई विश्लेषकों के अनुसार एक बहाना माना जा रहा है, ताकि वार्ता प्रक्रिया को अपने नियंत्रण में रखा जा सके और ऐसे पक्षों को बाहर किया जा सके जो इज़रायल पर जवाबदेही का दबाव बना सकते हैं।
“जेरूसलम पोस्ट” की रिपोर्ट के हवाले से सामने आई इस खबर ने यह भी संकेत दिया है कि इज़राइल अब केवल उन्हीं मध्यस्थों को स्वीकार करना चाहता है जो उसके रुख का समर्थन करें। इससे यह धारणा मजबूत होती है कि वह निष्पक्ष और संतुलित बातचीत के बजाय अपने अनुकूल माहौल तैयार करना चाहता है।
कुल मिलाकर, यह घटनाक्रम इस बात की ओर इशारा करता है कि इज़रायल की प्राथमिकता शांति स्थापित करना नहीं, बल्कि अपने रणनीतिक हितों को आगे बढ़ाना है—चाहे अगर इसके लिए उसे निष्पक्ष मध्यस्थों को भी किनारे करना पड़े।

