ईरान एक ऐसे दुश्मन से बातचीत कर रहा है जो अपने वादों का पालन नहीं करता: क़ालीबाफ़
ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाक़िर क़ालीबाफ़ ने कहा कि अमेरिका द्वारा की गई समुद्री नाकेबंदी अपने आप में एक बेहद कठिन और युद्ध जैसी स्थिति थी, जिसे आपसी समझौते के बाद समाप्त किया गया। उन्होंने कहा कि वर्तमान में ईरान का पूरा ध्यान समझौता ज्ञापन (मेमोरेंडम ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग) के अनुच्छेद 13 और उसके शुरुआती पाँच बिंदुओं को लागू कराने पर केंद्रित है।
क़ालीबाफ़ ने कहा कि समझौते के अनुसार अमेरिका ने यह सुनिश्चित करने की प्रतिबद्धता जताई है कि लेबनान में युद्ध समाप्त होगा और लेबनान को अपने पूरे क्षेत्र पर संप्रभुता प्राप्त होगी। ईरान इसी प्रतिबद्धता के पूर्ण क्रियान्वयन की मांग कर रहा है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि इस समय ईरान किसी नए समझौते के लिए वार्ता नहीं कर रहा है। उनके अनुसार, स्विट्ज़रलैंड में हुई बातचीत केवल समझौते के पहले पाँच बिंदुओं को लागू कराने के लिए थी। जब तक ये बिंदु पूरी तरह लागू नहीं हो जाते, तब तक किसी भी अगले चरण या नए विषय पर बातचीत शुरू नहीं होगी।
क़ालीबाफ़ ने कहा कि ईरान एक ऐसे दुश्मन से बातचीत कर रहा है जो अपने वादों का पालन नहीं करता और अवसर मिलते ही ईरान के विरुद्ध कार्रवाई करता है। इसलिए बातचीत के साथ-साथ देश हर प्रकार की सैन्य तैयारी भी बनाए हुए है। उन्होंने कहा कि यदि समझौते का पालन नहीं किया गया तो ईरान आवश्यक प्रतिक्रिया देने और युद्ध के लिए भी तैयार है।
उन्होंने दावा किया कि इस समझौते का सबसे बड़ा विरोध इज़रायल कर रहा है और उसने इसे विफल करने के लिए हर संभव प्रयास किया। उनके अनुसार यह समझौता अमेरिका और इज़रायल की विफलता का दस्तावेज़ है।
क़ालीबाफ़ ने कहा कि स्विट्ज़रलैंड में हुई वार्ता में सबसे महत्वपूर्ण और प्राथमिक विषय लेबनान था। उन्होंने कहा कि मीडिया को केवल वर्तमान हमलों को नहीं दिखाना चाहिए, बल्कि यह भी बताना चाहिए कि लेबनान ने पहले किस प्रकार की परिस्थितियों का सामना किया और इस संघर्ष में चार हज़ार से अधिक लोग शहीद हुए।
उन्होंने कहा कि ईरान ने लेबनान की रक्षा के लिए इज़रायल पर जवाबी कार्रवाई की और साथ ही दुश्मन से समझौते के पालन की मांग भी जारी रखी। उनके अनुसार यदि कोई समस्या बातचीत से हल हो सकती है तो अनावश्यक टकराव की आवश्यकता नहीं होती। उन्होंने यह भी दावा किया कि स्विट्ज़रलैंड यात्रा के बाद लेबनान में संघर्ष, गोलाबारी और हताहतों की संख्या में कमी आई है, हालांकि कुछ समस्याएँ अभी भी बनी हुई हैं।
क़ालीबाफ़ ने कहा कि लोग देखें कि हिज़्बुल्लाह और शेख़ नईम क़ासिम का इस समझौते पर क्या रुख़ है, जबकि देश के भीतर कुछ लोग अलग रुख़ अपना रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका के भीतर भी इस मुद्दे पर अलग-अलग नेताओं की अलग-अलग राय है।
उन्होंने दोहराया कि ईरान की मिसाइल क्षमता और उसकी सैन्य ताकत किसी भी परिस्थिति में बातचीत का विषय नहीं है। प्रतिरोध मोर्चे (रेज़िस्टेंस) और उससे जुड़े समूहों पर भी कोई वार्ता नहीं होगी। साथ ही उन्होंने कहा कि यूरेनियम संवर्धन (एनरिचमेंट) ईरान का वैध अधिकार है और ईरान परमाणु अप्रसार संधि (NPT) के सभी प्रावधानों का पालन करता है।
क़ालीबाफ़ ने कहा कि जहाँ तक संभव होगा, समझौते को तर्क और कूटनीति के माध्यम से लागू कराया जाएगा, लेकिन यदि इससे परिणाम नहीं निकला तो ईरान अपनी शक्ति का भी प्रयोग करेगा। उनके अनुसार, जितनी अधिक सैन्य तैयारी होगी, उतनी ही मज़बूत स्थिति से बातचीत की जा सकेगी।
उन्होंने दावा किया कि अमेरिकी समुद्री नाकेबंदी पूरी तरह समाप्त हो चुकी है और यह सफलता सैन्य शक्ति तथा कूटनीति के संयुक्त प्रयासों का परिणाम है। उन्होंने कहा कि नाकेबंदी हटने के बाद से अब तक ईरान 4 करोड़ (40 मिलियन) बैरल से अधिक तेल निर्यात कर चुका है।
क़ालीबाफ़ ने कहा कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य से बिना अतिरिक्त शुल्क या बाधा के आवागमन की व्यवस्था केवल 60 दिनों के लिए है और ईरान किसी भी परिस्थिति में इस जलमार्ग पर अपने अधिकारों से पीछे नहीं हटेगा। उन्होंने यह भी कहा कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य का महत्व तभी है जब वहाँ से जहाज़ों की आवाजाही लगातार बढ़े, न कि कम हो।
उन्होंने दावा किया कि तेल संबंधी प्रतिबंध हट चुके हैं और ईरान अब अपना तेल पहले की तुलना में 20 प्रतिशत अधिक कीमत पर बेच रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि अमेरिका युद्ध चाहता है तो ईरान भी उसका जवाब देना जानता है। यदि ईरान को तेल बेचने से रोका गया तो फिर कोई भी देश तेल से लाभ नहीं उठा सकेगा।
आर्थिक मोर्चे पर क़ालीबाफ़ ने कहा कि सरकार का उद्देश्य जनता पर पड़ रहे आर्थिक बोझ को कम करना है और यह कार्य सम्मान के साथ किया गया है। उन्होंने कहा कि समझौते के अनुसार विभिन्न देशों में जमे ईरान के 24 अरब डॉलर में से 12 अरब डॉलर ईरान के केंद्रीय बैंक को उपलब्ध कराए जाएंगे, ताकि वह दुनिया के किसी भी देश से अपनी आवश्यकता के अनुसार किसी भी मुद्रा में आवश्यक वस्तुओं की खरीद कर सके।
अंत में उन्होंने राजनीतिक मतभेदों का उल्लेख करते हुए कहा कि व्यक्तिगत या राजनीतिक विरोध के कारण राष्ट्रीय हितों और जनता के अधिकारों को नुकसान नहीं पहुँचाया जाना चाहिए।

