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टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी पर आधी रात, गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज 

टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी पर आधी रात, गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज 

पश्चिम बंगाल में राजनीतिक लड़ाई तब और तेज़ हो गई है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के अखिल भारतीय महासचिव और डायमंड हार्बर से सांसद अभिषेक बनर्जी के ख़िलाफ़ एक एफआईर दर्ज की गई है। यह रिपोर्ट बिधाननगर नॉर्थ साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन में राजीव सरकार की शिकायत के बाद दर्ज किया गया। राजीव सरकार बीजेपी कार्यकर्ता हैं और उन्होंने बनर्जी पर पिछले महीने हुए विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान भड़काऊ भाषण देने का आरोप लगाया है।

पुलिस सूत्रों के अनुसार, एफआईआर में आरोप लगाया गया है कि अभिषेक बनर्जी ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह सहित विपक्षी नेताओं के खिलाफ भड़काऊ टिप्पणियां कीं और ऐसे भाषण दिए जिनसे सार्वजनिक व्यवस्था बिगड़ने की आशंका थी। शिकायत में चुनावी प्रचार के दौरान डीजे म्यूजिक को लेकर की गई टिप्पणियों का भी ज़िक्र किया गया है।

आधीरात को दर्ज इस एफआईआर के लिए लिखित शिकायत 5 मई को की गई थी। यानी विधानसभा चुनाव के नतीजे घोषित होने के ठीक एक दिन बाद। शिकायत में आरोप है कि मार्च से मई के बीच महेशतला, आरामबाग, हरिनघाटा और नंदीग्राम में रैलियों के दौरान बनर्जी के भाषणों ने वैमनस्य और राजनीतिक अशांति को बढ़ावा दिया। पुलिस ने अभिषेक बनर्जी पर भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 192, 196, 351(2) और 353(1)(c) के तहत, साथ ही जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 123(2) और 125 के तहत भी मामला दर्ज किया है। इनमें से कुछ अपराध गैर-जमानती हैं।

एफआईआर दर्ज किए जाने के समय को लेकर तीखी राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। तृणमूल कांग्रेस के कई नेताओं का मानना है कि यह कदम राजनीतिक बदले की एक बड़ी मुहिम का हिस्सा है, जिसका मकसद विधानसभा चुनावों के बाद बंगाल में विपक्षी आवाज़ों को दबाना है। गौरतलब है कि अभिषेक बनर्जी के खिलाफ एफआईआर ठीक उसके एक दिन बाद दर्ज की गई, जब उन्होंने बीजेपी पर ज़ोरदार सार्वजनिक हमला किया था और केंद्र सरकार पर बंगाल में चुनाव के बाद हुई हिंसा और चुनावी धांधली को होने देने का आरोप लगाया था।

एक्स पर कड़े शब्दों वाली पोस्ट में, बनर्जी ने आरोप लगाया कि 100 से ज़्यादा विधानसभा क्षेत्रों में टीएमसी के काउंटिंग एजेंटों को मतगणना केंद्रों से ज़बरदस्ती बाहर निकाल दिया गया था, और दावा किया कि केंद्रीय एजेंसियों और अधिकारियों ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया से समझौता किया है।

बनर्जी ने लिखा, “हम हर तरह की गैर-कानूनी हरकत, हेर-फेर और सत्ता के दुरुपयोग को, हमारे पास उपलब्ध हर संवैधानिक और कानूनी रास्ते से चुनौती देंगे।” साथ ही उन्होंने सुप्रीम कोर्ट और लोकतांत्रिक संस्थाओं में अपना भरोसा भी जताया। उन्होंने आगे आरोप लगाया कि चुनाव नतीजों के बाद जब TMC कार्यकर्ताओं और दफ्तरों पर हमले हो रहे थे, तब केंद्रीय बल “मूक दर्शक” बने रहे।

टीएमसी खेमे के राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इन टिप्पणियों से बीजेपी नेतृत्व शायद चिंतित हो गया है, क्योंकि बनर्जी बंगाल की राजनीति में विपक्ष की सबसे मज़बूत और आक्रामक आवाज़ों में से एक बनकर उभरे हैं। युवा मतदाताओं के बीच उनकी बढ़ती लोकप्रियता, टीएमसी के भीतर उनका संगठनात्मक नियंत्रण और बीजेपी नेतृत्व पर उनके सीधे हमले, उन्हें राज्य में भगवा पार्टी के लिए एक बड़ी राजनीतिक चुनौती बनाते हैं।

इसके अलावा टीएमसी नेताओं और समर्थकों ने यह सवाल भी उठाया है कि जब अमित शाह सहित कई बीजेपी नेताओं ने 2026 के चुनावी अभियान के दौरान कथित तौर पर बेहद आक्रामक और ध्रुवीकरण वाले भाषण दिए थे, तो फिर सिर्फ़ विपक्षी नेताओं को ही कानूनी जांच का सामना क्यों करना पड़ रहा है?

ध्यान रहे कि बंगाल में चुनावी रैलियों के दौरान, बीजेपी नेताओं ने बार-बार टीएमसी सरकार पर “तुष्टीकरण की राजनीति” का आरोप लगाया, “जनसांख्यिकीय बदलाव” की चेतावनी दी, और ऐलान किया था कि अगर बीजेपी सत्ता में नहीं आई, तो बंगाल की संस्कृति और सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी। विपक्षी दलों ने बीजेपी नेताओं पर आरोप लगाया कि वे चुनावों से पहले मतदाताओं को ध्रुवीकृत करने के लिए सांप्रदायिक बयानबाजी का इस्तेमाल कर रहे हैं।

एक बड़ी रैली में, अमित शाह ने कथित तौर पर घोषणा की थी कि बीजेपी “बंगाल को डर और घुसपैठ से मुक्त कराएगी।” टीएमसी नेताओं ने इन टिप्पणियों को एक तरह का सांकेतिक सांप्रदायिक संदेश बताया, जिसका मकसद चुनाव प्रचार के दौरान तनाव पैदा करना था। बीजेपी के अन्य नेताओं ने भी कथित तौर पर अपने राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ कड़ी भाषा का इस्तेमाल किया, टीएमसी कार्यकर्ताओं को “गुंडे” कहा और चेतावनी दी कि बीजेपी के सत्ता में आने पर उनके खिलाफ “कड़ी कार्रवाई” की जाएगी।

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