ईरान पर प्रतिबंध को लेकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में मतभेद गहराए
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में ईरान पर प्रतिबंधों को लेकर गहरा मतभेद सामने आया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि, परिषद के 15 में से 6 सदस्य देशों ने अमेरिका और यूरोपीय देशों द्वारा प्रस्तावित पुराने प्रतिबंधों की बहाली का समर्थन नहीं किया। प्रवक्ता के अनुसार, इस रुख़ से यह साबित होता है कि परिषद इस मुद्दे पर बंटी हुई है और क़रीब आधे सदस्य, जिनमें स्थायी सदस्य रूस और चीन भी शामिल हैं, ईरान पर दोबारा प्रतिबंध लगाने को न तो कानूनी, न वैध और न ही उचित मानते हैं।
शुक्रवार रात (4 अक्टूबर) को रूस और चीन द्वारा प्रस्ताव 2231 को छह महीने तक बढ़ाने से संबंधित एक मसौदा सुरक्षा परिषद में पेश किया गया। मतदान में रूस, चीन, पाकिस्तान और अल्जीरिया ने प्रस्ताव के पक्ष में वोट दिया, जबकि दक्षिण कोरिया और गुयाना ने तटस्थ रुख अपनाया। नौ देशों—फ्रांस, ब्रिटेन, अमेरिका, सिएरा लियोन, स्लोवेनिया, डेनमार्क, ग्रीस, पनामा और सोमालिया—ने विरोध में मतदान किया। बहुमत न मिलने के कारण प्रस्ताव पारित नहीं हो सका। इसके बाद रविवार (6 अक्टूबर) को जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन ने अमेरिका के साथ मिलकर ईरान पर पहले से हटाए गए छह प्रस्तावों को फिर से लागू करने का ऐलान कर दिया।
ईरानी प्रवक्ता इस्माइल बक़ाई ने इस घटनाक्रम को “रूल-बेस्ड सिस्टम” की असलियत बताते हुए कहा कि, इसमें ताकतवर देशों के आदेश चलते हैं और बाकी देशों से पालन की अपेक्षा की जाती है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि अमेरिका और यूरोप के दबाव में न झुकने वाले छह देशों की स्थिति सुरक्षा परिषद में गहरी दरार का संकेत है।
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराक़ची ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव और सुरक्षा परिषद अध्यक्ष को पत्र लिखकर इस क़दम को गैर-कानूनी और गैर-ज़रूरी करार दिया। उन्होंने अन्य देशों के विदेश मंत्रियों को भी पत्र भेजकर स्पष्ट किया कि, न ईरान और न ही कोई अन्य सदस्य देश इन अवैध दावों का पालन करने के लिए बाध्य है। अराक़ची ने चेतावनी दी कि, इस तरह के क़दमों को मान्यता देना अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन होगा।
उन्होंने यह भी दोहराया कि प्रस्ताव 2231 से जुड़े सभी प्रतिबंध 18 अक्टूबर 2025 को स्थायी रूप से समाप्त हो जाएंगे। इसलिए इन्हें बढ़ाने या फिर से लागू करने की किसी भी कोशिश को ईरान और उसके सहयोगी देश अवैध और अप्रभावी मानेंगे। इस घटनाक्रम ने न केवल सुरक्षा परिषद की एकजुटता पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि वैश्विक स्तर पर अमेरिका और उसके सहयोगियों की रणनीति को भी चुनौती दी है।

