हंगरी के चुनाव में ऑर्बान की हार और ईरान युद्ध से जुड़ा मुद्दा
यूरोपीय विशेषज्ञ डायना सूसोआका के अनुसार, हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ऑर्बान की संसदीय चुनाव में हार के पीछे केवल घरेलू मुद्दे ही नहीं, बल्कि उनकी विदेश नीति भी एक बड़ा कारण बनी। खासकर अमेरिका के साथ उनके बढ़ते रिश्तों ने यूरोप के कई मतदाताओं को नाराज़ किया।
सूसोआका ने कहा कि ऑर्बान का अमेरिकी नेताओं के साथ खुलकर खड़ा होना, ऐसे समय में जब यूरोप का एक बड़ा वर्ग ईरान के खिलाफ संभावित युद्ध और फिलिस्तीन पर हो रहे हमलों का विरोध कर रहा है, राजनीतिक रूप से नुकसानदायक साबित हुआ। उनके मुताबिक, यूरोप के कई लोग मानते हैं कि पश्चिमी नीतियों ने मध्य पूर्व में अस्थिरता बढ़ाई है।
उन्होंने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि डोनाल्ड ट्रंप के करीबी और उपराष्ट्रपति जेडी वेंस को चुनाव से ठीक पहले हंगरी बुलाना एक गलत रणनीति थी। इससे यह संदेश गया कि ऑर्बान बाहरी शक्तियों पर निर्भर हैं और यूरोपीय जनभावनाओं से कटे हुए हैं।
विशेषज्ञ का मानना है कि फिलिस्तीन के मुद्दे पर भी जनता की संवेदनशीलता काफी बढ़ चुकी है। ऐसे में, उन नेताओं के साथ मंच साझा करना जिन्हें इस संघर्ष के लिए जिम्मेदार माना जाता है, ऑर्बान की छवि को नुकसान पहुंचाने वाला कदम साबित हुआ।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस चुनाव में मतदाताओं ने यह संकेत दिया है कि वे स्वतंत्र और संतुलित विदेश नीति चाहते हैं। खासकर ऐसे समय में जब ईरान के साथ तनाव और मध्य पूर्व की स्थिति वैश्विक राजनीति का केंद्र बनी हुई है।
🔹कुल मिलाकर, यह चुनाव परिणाम केवल एक देश की राजनीति नहीं, बल्कि यूरोप में बदलते जनमत, युद्ध-विरोधी भावना और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रभाव को भी दर्शाता है।

