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“धर्म परिवर्तन” पर ओबीसी श्रेणी में मिलने वाली सुविधाओं को समाप्त नहीं किया जा सकता: बॉम्बे हाईकोर्ट

“धर्म परिवर्तन” पर ओबीसी श्रेणी में मिलने वाली सुविधाओं को समाप्त नहीं किया जा सकता: बॉम्बे हाईकोर्ट

उरण नगर परिषद की महिला पार्षद नंदा नामदेव म्हात्रे, जिन्हें नाहिदा इरफान ठाकुर के नाम से भी जाना जाता है, ने एक मुस्लिम व्यक्ति से विवाह करने के बाद इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया था। उन्हें उस समय राहत मिली, जब बॉम्बे हाईकोर्ट ने रायगढ़ जिला जाति प्रमाणपत्र जांच समिति द्वारा ओबीसी श्रेणी के तहत मिलने वाले लाभों के संबंध में दिए गए फैसले को आंशिक रूप से खारिज कर दिया। हालांकि, अदालत ने इस मामले में समिति को दोबारा सुनवाई करने और नवंबर तक सुनवाई पूरी करके अपना फैसला सुनाने का निर्देश भी दिया है।

2025 में उरण नगर परिषद के हुए चुनाव में कांग्रेस की उम्मीदवार नंदा नामदेव म्हात्रे उर्फ नाहिदा इरफान ठाकुर ने ओबीसी आरक्षित वार्ड नंबर 5 से 831 वोट हासिल कर भाजपा उम्मीदवार धनश्री दिवाकर शिंदे को हराया था। हालांकि, चुनाव में जीत हासिल करने के बाद उनके मुस्लिम व्यक्ति से विवाह करने और धर्म परिवर्तन करने को लेकर रायगढ़ जिला जाति प्रमाणपत्र जांच समिति के समक्ष शिकायत दर्ज कराई गई थी।

जाति प्रमाणपत्र जांच समिति ने धर्म परिवर्तन का हवाला देते हुए ओबीसी श्रेणी के तहत मिलने वाले लाभों को गैरकानूनी क़रार दिया और उनकी चुनावी जीत को अमान्य घोषित कर दिया था।

इसके बाद कांग्रेस पार्षद ने समिति के इस फैसले के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट की दो सदस्यीय पीठ के समक्ष याचिका दायर की। इस पीठ में न्यायमूर्ति रियाज़ छागला और न्यायमूर्ति फिरदौस पी. पूनीवाला शामिल थे। याचिका में जाति प्रमाणपत्र जांच समिति के फैसले को गलत और अवैध बताते हुए उसे रद्द करने की मांग की गई थी।

बचाव पक्ष के वकील चिंतामणि भंगोजी ने अदालत में दाखिल याचिका के माध्यम से दलील दी कि किसी व्यक्ति के धर्म परिवर्तन करने से ओबीसी जाति से उसका संबंध समाप्त नहीं होता और न ही ओबीसी श्रेणी के तहत मिलने वाले लाभों को खत्म किया जा सकता है।

वकील ने जाति प्रमाणपत्र जांच समिति के फैसले को संविधान के विरुद्ध बताते हुए यह भी कहा कि इस संबंध में 1983 और 1996 में सरकार द्वारा पारित प्रस्तावों के अनुसार, किसी व्यक्ति के अंतरधार्मिक विवाह करने या धर्म परिवर्तन करने के कारण ओबीसी श्रेणी के तहत मिलने वाले लाभों को न तो निलंबित किया जा सकता है और न ही समाप्त किया जा सकता है।

दो सदस्यीय पीठ ने इन दलीलों को सुनने और इस संबंध में जाति प्रमाणपत्र जांच समिति द्वारा दिए गए फैसले की समीक्षा करने के बाद समिति के फैसले को आंशिक रूप से खारिज कर दिया। साथ ही, अदालत ने जाति प्रमाणपत्र जांच समिति को मामले की दोबारा सुनवाई करने का आदेश दिया है। अदालत ने निर्देश दिया है कि समिति 23 नवंबर तक सुनवाई पूरी करे और उसके बाद मामले में अपना फैसला सुनाए।

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