अमेरिका अब भरोसे के क़ाबिल नहीं रहा: मैक्रों
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ( Emmanuel Macron) ने कहा कि यूरोपीय देश अब ऐसी स्थिति में हैं, जहां उन्हें अपने हितों की रक्षा के लिए खुद पर भरोसा करना होगा।
उन्होंने कहा कि,
यूरोपीय देशों को अब अपनी सुरक्षा, आर्थिक हितों और रणनीतिक नीतियों के लिए पूरी तरह अमेरिका पर निर्भर रहने की सोच बदलनी होगी। उनका कहना है कि बदलते वैश्विक हालात में यूरोप को आत्मनिर्भर बनकर अपने हितों की रक्षा करनी होगी।
डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) के पहले राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान कई यूरोपीय देशों को लगता था कि यह स्थिति अस्थायी है और किसी बड़े बदलाव की आवश्यकता नहीं है। लेकिन अब हालात को लेकर सोच अधिक यथार्थवादी हो गई है, और यूरोपीय देशों के साझा कदम उठाने की जरूरत पहले से ज्यादा महसूस की जा रही है ताकि वे अपने हितों की रक्षा कर सकें।
अब यूरोप में कोई भी अमेरिका को ऐसा सहयोगी नहीं मानता, जिस पर पूरी तरह भरोसा किया जा सके।
मैक्रों के इस बयान को यूरोप की बदलती रणनीतिक सोच के रूप में देखा जा रहा है, जहां अब अमेरिका को ऐसा स्थायी सहयोगी नहीं माना जा रहा, जिस पर हर परिस्थिति में पूरी तरह भरोसा किया जा सके। यही कारण है कि यूरोपीय देशों में आत्मनिर्भरता और साझा हितों की रक्षा पर जोर लगातार बढ़ता जा रहा है।
“कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि, डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) प्रशासन की विदेश नीति का मूल उद्देश्य केवल अमेरिकी हितों की पूर्ति रहा है, और इसी रणनीति के तहत यूरोपीय देशों को ऐसे संघर्षों में झोंकने की कोशिश की जाती है जिनके पीछे मुख्य रूप से वॉशिंगटन के अपने सामरिक और आर्थिक हित छिपे होते हैं।
NATO के सहयोग से विभिन्न क्षेत्रों में हस्तक्षेप की अमेरिकी नीति को लेकर यूरोप में भी सवाल उठते रहे हैं कि कहीं उसे ऐसी लड़ाइयों में न धकेला जाए, जिनका सीधा लाभ अंततः अमेरिका को ही मिले।
उदाहरण के तौर पर Venezuela, Syria और Iran जैसे देशों का उल्लेख किया जाता है, जहाँ अमेरिकी हस्तक्षेप और दबाव की नीतियों ने व्यापक भू-राजनीतिक तनाव को जन्म दिया। कुछ पर्यवेक्षकों का मत है कि सीरिया और वेनेज़ुएला में अमेरिका अपने कुछ रणनीतिक उद्देश्यों को आगे बढ़ाने में सफल रहा, लेकिन ईरान के मामले में उसे कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ा।
उनके अनुसार, Islamic Revolutionary Guard Corps तथा ईरानी सैन्य क्षमताओं की जवाबी रणनीति ने अमेरिकी दबाव को खुली चुनौती दी, जिससे अमेरिका की सैन्य प्रतिष्ठा और उसकी तथाकथित ‘सुपरपावर’ छवि पर प्रश्नचिह्न लगे। इसी कारण अब यह धारणा भी व्यक्त की जाती है कि बढ़ते तनाव, क्षेत्रीय अस्थिरता और संभावित व्यापक युद्ध के ख़तरे को देखते हुए वॉशिंगटन टकराव से निकलने के लिए किसी राजनयिक रास्ते की तलाश कर रहा है।”

