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केरल में मुख्यमंत्री के चयन को लेकर कांग्रेस के सामने नई चुनौती

केरल में मुख्यमंत्री के चयन को लेकर कांग्रेस के सामने नई चुनौती

केरल विधानसभा चुनाव में शानदार जीत हासिल करने के बावजूद कांग्रेस पार्टी की मुश्किलें बढ़ गई हैं। इसकी वजह यह है कि कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) के भीतर इस बात को लेकर मतभेद शुरू हो गया है कि मुख्यमंत्री पद के लिए किसे चुना जाए। यूडीएफ ने 140 सदस्यीय विधानसभा में 102 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया है।

यह जीत कांग्रेस के लिए बड़ी सफलता मानी जा रही है, लेकिन मुख्यमंत्री के चेहरे को लेकर पार्टी के अंदरूनी मतभेद अब उसके लिए सिरदर्द बनते जा रहे हैं। मुख्यमंत्री पद के लिए दो प्रमुख दावेदार सामने हैं—वी.डी. सतीशन और के.सी. वेणुगोपाल।

वी.डी. सतीशन के समर्थन में सड़कों पर उतरे कांग्रेस कार्यकर्ता

वी.डी. सतीशन पिछली विधानसभा में विपक्ष के नेता थे। पिछले पांच वर्षों के दौरान उन्होंने विधानसभा में केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन की सरकार पर लगातार तीखे हमले किए और सरकार के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाए रखा। उन्होंने भ्रष्टाचार और कई प्रशासनिक मुद्दों को लेकर सरकार को घेरा। चुनाव से पहले सतीशन ने कहा था कि यदि यूडीएफ 100 सीटें नहीं जीतती है तो वह राजनीति छोड़ देंगे।

चुनाव परिणाम उनके दावे के अनुरूप आए। ऐसे में पार्टी कार्यकर्ताओं का मानना है कि केरल में यूडीएफ की जीत का सबसे बड़ा श्रेय वी.डी. सतीशन को जाता है। राज्य के कई इलाकों में कांग्रेस कार्यकर्ता सड़कों पर उतर आए और “हमें वी.डी. चाहिए” तथा “जिसने लड़ाई लड़ी, वही सरकार चलाए” जैसे नारे लगाए। इसी बीच के.सी. वेणुगोपाल भी मुख्यमंत्री पद की दौड़ में शामिल हो गए हैं।

के.सी. वेणुगोपाल के साथ रमेश चेन्नीथला का नाम भी चर्चा में
के.सी. वेणुगोपाल का नाम मुख्यमंत्री पद की दौड़ में शामिल होने के बाद विवाद और गहरा गया है। वेणुगोपाल को राहुल गांधी का करीबी माना जाता है।

यह भी कहा जा रहा है कि कांग्रेस के 63 निर्वाचित विधायकों में से अधिकांश उनके समर्थक हैं। इसके बावजूद आम लोगों का मानना है कि सतीशन ने पांच वर्षों तक विपक्ष का नेतृत्व किया और जमीनी स्तर पर सीपीआई (एम) सरकार के खिलाफ संघर्ष किया। इसलिए यदि पार्टी राज्य में चुनाव जीतने में सफल हुई है तो इसका पुरस्कार सतीशन को मिलना चाहिए, न कि वेणुगोपाल को।

वेणुगोपाल फिलहाल विधानसभा के सदस्य नहीं हैं। कांग्रेस ने चुनाव से पहले यह फैसला किया था कि किसी सांसद को विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार नहीं बनाया जाएगा। गौरतलब है कि वेणुगोपाल अलप्पुझा से लोकसभा सांसद हैं।वेणुगोपाल के साथ कांग्रेस नेता रमेश चेन्नीथला का नाम भी मुख्यमंत्री पद के संभावित दावेदारों में लिया जा रहा है। कांग्रेस का एक वर्ग मानता है कि वेणुगोपाल के साथ-साथ चेन्नीथला भी इस पद के मजबूत उम्मीदवार हैं, क्योंकि सतीशन से पहले वे भी विधानसभा में विपक्ष के नेता रह चुके हैं।

पार्टी नेतृत्व के सामने क्या है चुनौती?
केरल में कांग्रेस की समस्या केवल दो नेताओं के बीच मुख्यमंत्री चुनने तक सीमित नहीं है। पार्टी के सामने बड़ी चुनौती यह भी है कि यदि सतीशन को नजरअंदाज किया गया तो उनके समर्थकों में नाराजगी बढ़ सकती है। दूसरी ओर, यदि वेणुगोपाल को किनारे किया गया तो केंद्रीय नेतृत्व की स्थिति कमजोर पड़ सकती है।

कार्यकर्ताओं के सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन करने से पार्टी की छवि को भी नुकसान पहुंचा है। राज्य कांग्रेस अध्यक्ष सनी जोसेफ ने इस तरह के प्रदर्शनों के खिलाफ चेतावनी दी है, लेकिन इसके बावजूद कार्यकर्ता लगातार सड़कों पर उतर रहे हैं।

केरल की राजनीति में ऐसा पहले भी हो चुका है। वर्ष 2006 में सीपीएम के भीतर वी.एस. अच्युतानंदन और पिनराई विजयन के बीच नेतृत्व को लेकर विवाद खड़ा हो गया था। उस समय पार्टी ने अच्युतानंदन को नजरअंदाज कर दिया था, लेकिन कार्यकर्ता उनके समर्थन में सड़कों पर उतर आए। अंततः पार्टी को झुकना पड़ा और अच्युतानंदन को ही मुख्यमंत्री बनाया गया। उस दौर में वह विपक्ष के नेता के रूप में कांग्रेस के खिलाफ मजबूती से खड़े थे।

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