अमेरिका ने ईरान के खिलाफ दोबारा समुद्री नाकेबंदी की दी धमकी, सैन्य दबाव बढ़ाने के दावा
तेहरान: ईरान पर लगातार दबाव बनाने की अमेरिकी नीति के बीच एक बार फिर वॉशिंगटन की ओर से कड़े कदम उठाने के संकेत दिए गए हैं। फ़ार्स न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, बुधवार तड़के अमेरिकी अधिकारियों ने द वॉल स्ट्रीट जर्नल से बातचीत में दावा किया कि अमेरिकी नौसेना के युद्धपोत राष्ट्रपति के आदेश पर ईरान के बंदरगाहों की दोबारा समुद्री नाकेबंदी लागू करने के लिए तैयार हैं। यदि अमेरिका ऐसा कदम उठाता है, तो इसे अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों में तनाव बढ़ाने वाला कदम माना जा सकता है और इससे क्षेत्रीय स्थिरता तथा वैश्विक समुद्री व्यापार पर भी गंभीर प्रभाव पड़ने की आशंका है।
इसी बीच, एक अमेरिकी अधिकारी ने सीएनएन से बातचीत में दावा किया कि ईरान के खिलाफ चल रही सैन्य कार्रवाई केवल जवाबी कार्रवाई नहीं, बल्कि तथाकथित “दंडात्मक अभियान” का हिस्सा है। अधिकारी के अनुसार, यह अभियान अभी समाप्त नहीं हुआ है और अमेरिकी सैन्य कार्रवाई आगे भी जारी रह सकती है। इस बयान को अमेरिका की आक्रामक नीति का संकेत माना जा रहा है।
वहीं, समाचार वेबसाइट एक्सियोस ने एक अमेरिकी अधिकारी के हवाले से दावा किया कि हालिया हमलों में ईरान की वायु रक्षा प्रणालियों, जहाज़-रोधी क्रूज़ मिसाइल ठिकानों, ड्रोन प्रक्षेपण स्थलों और बंदरगाहों से संबंधित सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया। हालांकि, इन दावों की किसी स्वतंत्र स्रोत से पुष्टि नहीं हुई है और ईरान की ओर से भी इन सभी दावों पर कोई आधिकारिक पुष्टि जारी नहीं की गई है।
उधर, इस्राईली मीडिया ने एक वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी के हवाले से दावा किया कि ईरान और अमेरिका के बीच लागू युद्धविराम की स्थिति नाज़ुक बनी हुई है और अमेरिकी सैन्य कार्रवाइयों के कारण क्षेत्र में तनाव दोबारा बढ़ सकता है।
एक अन्य रिपोर्ट में एक्सियोस के इस्राईली संवाददाता ने एक वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी के हवाले से दावा किया कि दक्षिणी ईरान में बुधवार रात किए गए हमले लगभग दस दिन पहले हुए हमलों की तुलना में चार से पाँच गुना अधिक व्यापक थे। हालांकि, इस दावे की भी किसी स्वतंत्र एजेंसी ने पुष्टि नहीं की है।
गौरतलब है कि इस पूरी रिपोर्ट में सामने आए अधिकांश दावे अमेरिकी अधिकारियों और पश्चिमी मीडिया संस्थानों के हवाले से किए गए हैं। ईरान ने इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। ऐसे में इन खबरों को केवल संबंधित पक्षों के दावों के रूप में ही देखा जाना चाहिए, न कि अंतिम रूप से सत्यापित तथ्य के रूप में।

