वाशिंगटन : अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध को लेकर फॉरेन अफेयर्स की एक रिपोर्ट में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की युद्ध रणनीति पर सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट में युद्ध का विश्लेषण ‘पॉवेल डॉक्ट्रिन’ के आधार पर किया गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप ने युद्ध शुरू करने से पहले उन जरूरी सिद्धांतों का पालन नहीं किया, जिन्हें अमेरिका ने वियतनाम युद्ध और लेबनान में अपने सैन्य अनुभवों के बाद विकसित किया था।
पॉवेल डॉक्ट्रिन का मूल विचार यह है कि अमेरिका को बिना स्पष्ट जरूरत और लक्ष्य के किसी युद्ध में शामिल नहीं होना चाहिए।
युद्ध शुरू करने से पहले कुछ अहम सवालों के जवाब स्पष्ट होने चाहिए। जैसे- अमेरिका का महत्वपूर्ण राष्ट्रीय हित क्या है? युद्ध का राजनीतिक और सैन्य लक्ष्य क्या है? जीत हासिल करने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं या नहीं? कांग्रेस और जनता का समर्थन है या नहीं? अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिलने वाला सहयोग कितना है? युद्ध खत्म करने का रास्ता क्या होगा?
फॉरेन अफेयर्स के विश्लेषण के अनुसार, ईरान के मामले में इन सिद्धांतों का पर्याप्त पालन नहीं हुआ। अमेरिका के लिए युद्ध के लक्ष्य साफ नहीं थे।
रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप प्रशासन ने युद्ध के अलग-अलग चरणों में कई लक्ष्य बताए। इनमें ईरान की मिसाइल क्षमता को नष्ट करना और शासन परिवर्तन जैसे लक्ष्य शामिल थे। समस्या यह थी कि इन सभी लक्ष्यों को हासिल करने के लिए जितने संसाधनों और लंबे सैन्य अभियान की जरूरत थी, उसके मुकाबले युद्ध की तैयारी पर्याप्त नहीं थी। अमेरिका के सामने यह स्पष्ट नहीं था कि वह आखिर किस लक्ष्य को हासिल करने के लिए युद्ध लड़ रहा है।
साथ ही ट्रंप प्रशासन के पास युद्ध से बाहर निकलने की कोई स्पष्ट योजना नहीं थी।
पॉवेल डॉक्ट्रिन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है कि युद्ध शुरू करने से पहले ही यह तय होना चाहिए कि उससे बाहर कैसे निकला जाएगा।
फॉरेन अफेयर्स के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन ने युद्ध शुरू करने से पहले यह स्पष्ट नहीं किया कि युद्ध किन परिस्थितियों में खत्म होगा।
रिपोर्ट के अनुसार, अब अमेरिका के सामने सबसे बड़ा विकल्प ईरानी सरकार के कमजोर पड़ने या उसके पतन की उम्मीद करना रह गया है। लेकिन ऐसा होना आसान नहीं माना जा रहा।
अमेरिका ने कूटनीति को पूरा मौका दिए बिना सैन्य कार्रवाई शुरू की, इस पर फॉरेन अफेयर्स ने यह सवाल उठाया कि अमेरिका ने सैन्य कार्रवाई का रास्ता उस समय चुना, जब अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत जारी थी।
रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका के पास आर्थिक और कूटनीतिक दबाव बढ़ाने के दूसरे विकल्प भी मौजूद थे। इसके बावजूद सैन्य शक्ति का इस्तेमाल किया गया।
पॉवेल डॉक्ट्रिन के मुताबिक, सैन्य कार्रवाई को आम तौर पर अंतिम विकल्प माना जाना चाहिए। रिपोर्ट का दावा है कि इस सिद्धांत को नजरअंदाज किया गया।
साथ ही ट्रंप ने अमेरिका के पारंपरिक और पुराने सहयोगियों को भी नजरअंदाज किया। इस रिपोर्ट में अमेरिका के सहयोगी देशों की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया गया है।
ट्रंप प्रशासन पर आरोप है कि उसने युद्ध शुरू करने से पहले क्षेत्रीय सहयोगियों से पर्याप्त सलाह नहीं ली। खासतौर पर खाड़ी देशों को ईरान की जवाबी कार्रवाई का सीधा खतरा झेलना पड़ा।
इसके कारण कुछ अरब देशों का युद्ध के प्रति समर्थन कम हुआ। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कुछ देशों ने हुर्मुज स्ट्रेट को दोबारा खोलने में सहयोग करने से भी दूरी बनाई।
फॉरेन अफेयर्स के अनुसार, अमेरिकी रणनीति की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक यह भी रही कि सरकार ने जीत की स्पष्ट परिभाषा नहीं दी।
युद्ध के दौरान अमेरिका के बताए गए लक्ष्य बदलते रहे। शुरुआत में ईरान की मिसाइल क्षमता को खत्म करने की बात कही गई, जबकि बाद में ईरान के लंबी दूरी की मिसाइल रखने के अधिकार को लेकर अलग बयान सामने आए।
ऐसे में यह तय करना मुश्किल हो गया कि अमेरिका अपने उद्देश्य को हासिल करने के बाद युद्ध कब खत्म करेगा।
फॉरेन अफेयर्स का निष्कर्ष है कि ट्रंप प्रशासन ने पॉवेल डॉक्ट्रिन के प्रमुख सिद्धांतों को नजरअंदाज किया। स्पष्ट लक्ष्य, पर्याप्त संसाधन, कूटनीतिक प्रयास, सहयोगियों का समर्थन और युद्ध से बाहर निकलने की योजना जैसे मुद्दों पर सवाल उठे हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, यह रणनीति अमेरिका के लिए एक नई सफल युद्ध नीति का मॉडल बनने के बजाय उसकी सैन्य और राजनीतिक शक्ति को लंबे समय तक कमजोर करने वाला रास्ता साबित हो सकती है।

