ट्रंप के विरुद्ध अरब देशों में बढ़ता ग़ुस्सा और अमेरिकी सैन्य अड्डों का अनिश्चित भविष्य
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच ‘वॉशिंगटन पोस्ट’ ने शनिवार को प्रकाशित अपनी एक रिपोर्ट में बताया कि, खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका के सहयोगी देशों के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रति असंतोष अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है।
फार्स न्यूज़ एजेंसी के अंतरराष्ट्रीय समूह के अनुसार, अरब और पश्चिमी अधिकारियों का कहना है कि खाड़ी क्षेत्र में वॉशिंगटन के प्रति नाराज़गी लगातार बढ़ रही है। अमेरिका के सहयोगी देश इस बात को लेकर चिंतित हैं कि, डोनाल्ड ट्रंप ईरान के साथ शांति स्थापित करने के लिए कूटनीति को प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाने में सक्षम नहीं हैं।
वॉशिंगटन पोस्ट के अनुसार, ट्रंप ने हाल के सप्ताहों में कई बार ईरान को धमकियां दीं, लेकिन बाद में बातचीत में प्रगति का दावा करते हुए उन धमकियों को वापस ले लिया।
तीन अधिकारियों और एक पूर्व अमेरिकी राजनयिक के अनुसार, महीनों से जारी संघर्ष तथा ईरान और प्रतिरोध समूहों की ओर से लगातार हो रहे मिसाइल और ड्रोन हमलों के बीच सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत और बहरीन की सरकारें अब ट्रंप प्रशासन से नाराज़गी के मामले में एक जैसी राय रखने लगी हैं।
इनमें से कुछ देशों ने अपने यहां अमेरिकी सैन्य प्रतिष्ठानों की मेजबानी जारी रखने की उपयोगिता पर भी चर्चा शुरू कर दी है।
खाड़ी देश के एक अधिकारी ने कहा:
“ट्रंप ने यह युद्ध शुरू किया और इसकी कीमत हम चुका रहे हैं।” उन्होंने आगे कहा कि, इस समय अमेरिका के प्रति गुस्सा पिछले साल मार्च में अमेरिका और इस्राईल द्वारा ईरान पर शुरू किए गए हमले के बाद से अपने सबसे ऊंचे स्तर पर है।
खाड़ी देश अभी भी वॉशिंगटन को अपना करीबी सुरक्षा साझेदार और हथियारों का प्रमुख आपूर्तिकर्ता मानते हैं। क़तर और बहरीन में अमेरिका के बड़े सैन्य अड्डे भी मौजूद हैं। लेकिन मौजूदा नाराज़गी ने कुछ देशों को वैकल्पिक सुरक्षा व्यवस्थाओं पर विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है।
विश्लेषकों का कहना है कि इन घटनाक्रमों से निकट भविष्य में क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था में कोई बड़ा बदलाव होने की संभावना कम है, लेकिन कुछ देशों ने अपने विकल्पों की समीक्षा शुरू कर दी है। एक वरिष्ठ यूरोपीय अधिकारी ने कहा कि पिछले सप्ताह सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच हुआ रक्षा समझौता अमेरिका के लिए एक स्पष्ट संकेत था।
खाड़ी देशों के नेताओं के साथ नियमित संपर्क रखने वाले इस अधिकारी ने कहा कि यह समझौता दर्शाता है कि तीन शक्तिशाली सुन्नी देश अपनी सुरक्षा और रक्षा साझेदारियों में विविधता लाने की कोशिश कर रहे हैं। उनके अनुसार, इन देशों की सोच है कि “अमेरिका पर्याप्त नहीं है।”
यूरेशिया इंस्टीट्यूट में मध्य पूर्व और उत्तर अफ्रीका के निदेशक फिरास मोकदाद ने कहा:
“शुरुआत से ही असंतोष मौजूद था।”
उनके अनुसार, खाड़ी में अमेरिका के सहयोगी देशों को लगता है कि वे “अनावश्यक रूप से” ऐसे युद्ध में फंस गए हैं, जिसे खत्म करने में अब ट्रंप को कठिनाई हो रही है।
मोकदाद ने कहा कि क्षेत्र के देशों के बीच ट्रंप की ईरान नीति को अक्सर “अव्यवस्थित” और “अप्रत्याशित” बताया जाता है।
वॉशिंगटन स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ अरब गल्फ स्टेट्स की शोधकर्ता एना जैकब्स ने कहा कि युद्ध शुरू होने के बाद से अमेरिका के प्रति विश्वास में कमी आई है।
उनके मुताबिक, अमेरिका के सहयोगी देशों को लगता है कि “क्षेत्र में अमेरिका का व्यवहार उन्हें अधिक सुरक्षित नहीं बना रहा, बल्कि और अधिक असुरक्षित बना रहा है।”
हालांकि, क्षेत्र में मौजूद एक पश्चिमी राजनयिक ने कहा कि ये बदलाव अमेरिका के प्रति खाड़ी देशों के रुख में किसी बड़े परिवर्तन का संकेत नहीं हैं। उनके अनुसार, ईरान के साथ युद्ध शुरू होने से पहले भी क्षेत्र में अमेरिकी सैनिकों का स्वागत “उत्साह के साथ” नहीं किया जाता था।
राजनयिक ने कहा:
“इसे अधिकतर एक आवश्यक बुराई माना जाता था। अब उस आवश्यकता पर ही सवाल उठने लगा है।”
वॉशिंगटन पोस्ट के अनुसार, युद्ध को लेकर खाड़ी देशों के नेताओं का नजरिया भी बदल गया है। ओमान शुरू से ही संघर्ष का विरोध करता रहा है, जबकि सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन ने कुछ चरणों में युद्ध का समर्थन किया था।
एक वरिष्ठ यूरोपीय अधिकारी ने कहा:
“युद्ध की शुरुआत में वे पूरी तरह इसके विरोध में नहीं थे। मैं यह नहीं कहूंगा कि वे इसके समर्थक थे, लेकिन ईमानदारी से कहें तो वे पूरी तरह युद्ध के खिलाफ भी नहीं थे।”
उनके अनुसार, अबू धाबी और रियाद में उस समय यह सोच थी कि तेज और निर्णायक जीत उनके लिए फायदेमंद साबित हो सकती है।
अधिकारी ने बताया कि ईरान और अमेरिका के बीच अप्रैल में होने वाली पहली दौर की बातचीत से पहले यह सोच बदलनी शुरू हुई। उस समय यह स्पष्ट होने लगा कि न तो ईरान की सरकार गिरने वाली है और न ही ईरान होर्मुज़ जलडमरूमध्य को खोलने वाला है।
कुवैत विश्वविद्यालय में इतिहास के सहायक प्रोफेसर बदर अल-सैफ ने कहा कि उसके बाद के महीनों में ट्रंप के लगातार बदलते और विरोधाभासी बयानों ने खाड़ी देशों की चिंता बढ़ा दी है।
ईरान और अमेरिका के बीच हुए समझौता ज्ञापन का उल्लेख करते हुए अल-सैफ ने कहा:
“ट्रंप के साथ इन उतार-चढ़ावों से पहले भी कोई स्पष्ट रणनीति मौजूद नहीं थी।” कुवैत और इराक में अमेरिका के पूर्व राजदूत डगलस सीलीमन ने कहा कि अपनी हालिया क्षेत्रीय यात्रा के दौरान उन्होंने वॉशिंगटन के प्रति काफी असंतोष देखा, हालांकि उनके मुताबिक तेहरान के प्रति भी नाराज़गी मौजूद है।
अब इंस्टीट्यूट ऑफ अरब गल्फ स्टेट्स के प्रमुख सीलीमन ने क्षेत्र की मौजूदा भावना को “एक अजीब तरह का विरोधाभास” बताया। उनके अनुसार, खाड़ी देश एक तरफ युद्ध शुरू करने के लिए अमेरिका से नाराज़ हैं, जबकि दूसरी तरफ हथियारों, गोला-बारूद और खुफिया जानकारी के लिए अमेरिका पर निर्भर भी हैं।
वॉशिंगटन पोस्ट के अनुसार, यदि संघर्ष जारी रहता है तो खाड़ी देशों पर आर्थिक दबाव और बढ़ सकता है। सामान्य शांति के समय भी गर्मियों में इस क्षेत्र में गतिविधियां कम हो जाती हैं, पर्यटन घट जाता है और लोग भीषण गर्मी से बचने के लिए अधिक समय घरों में बिताते हैं।
लेकिन शरद ऋतु में तापमान कम होने के साथ आर्थिक और सामाजिक गतिविधियां फिर तेज हो जाती हैं। इस वर्ष अक्टूबर से दिसंबर तक कई सम्मेलन, शिखर बैठकें, उत्सव और फॉर्मूला-1 प्रतियोगिताएं आयोजित होनी थीं, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों के कारण ये सभी फिलहाल अनिश्चितता की स्थिति में हैं।
एक पश्चिमी राजनयिक ने कहा कि सऊदी अरब की वार्षिक ‘फ्यूचर इन्वेस्टमेंट इनिशिएटिव’ का दसवां संस्करण, जो अक्टूबर के अंत में लगभग दो महीने बाद आयोजित होने वाला है और जिसे “रेगिस्तान का दावोस” भी कहा जाता है, यह परखने की पहली बड़ी कसौटी हो सकता है कि क्या वरिष्ठ अधिकारी और बड़े कारोबारी मौजूदा परिस्थितियों के बावजूद क्षेत्र का दौरा करने के लिए तैयार हैं।

