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इस्राईल ने अमेरिका के साथ-साथ पूरी दुनिया को खो दिया है: पूर्व इस्राईली पीएम 

इस्राईल ने अमेरिका के साथ-साथ पूरी दुनिया को खो दिया है: पूर्व इस्राईली पीएम 

इस्राईल के पूर्व प्रधानमंत्री नाफ्ताली बेनेट ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस्राईल के बढ़ते अलगाव को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि इस्राईल ने “अमेरिका और दुनिया को खो दिया है।” उन्होंने स्वीकार किया कि 1948 में स्थापना के बाद से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस्राईल की स्थिति इस समय अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है।

तेल अवीव में आयोजित एक सुरक्षा सम्मेलन में नाफ्ताली बेनेट ने इस्राईल की मौजूदा अंतरराष्ट्रीय स्थिति पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि इस्राईल अभूतपूर्व अंतरराष्ट्रीय अलगाव का सामना कर रहा है। बेंट ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “हमने अमेरिका और दुनिया को खो दिया है।” उनके इस बयान से पता चलता है कि इस्राईल की नीतियों के कारण उसके अंतरराष्ट्रीय समर्थन में लगातार गिरावट आ रही है।

आगामी संसदीय चुनावों से पहले बेंट को बेंजामिन नेतन्याहू के प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों में माना जा रहा है। उन्होंने नेतन्याहू सरकार की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि, मौजूदा सरकार को “कहीं भी जीतना नहीं आता—न ग़ाज़ा में और न ही लेबनान में।” उन्होंने यह भी कहा कि, इस्राईल के पास अपने ख़िलाफ़ चलाए जा रहे कथित “प्रभाव अभियानों” का प्रभावी ढंग से मुकाबला करने के लिए कोई मजबूत और प्रभावी संस्थान नहीं है।

इस्राईल के अंतरराष्ट्रीय अलगाव का सबसे बड़ा कारण उसकी लंबे समय से चली आ रही आक्रामक और दमनकारी नीतियां हैं। अक्टूबर 2023 से ग़ाज़ा में चलाए गए व्यापक सैन्य अभियान ने इस्राईल की छवि को दुनिया भर में गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाया है। ग़ाज़ा में बड़ी संख्या में फ़िलिस्तीनियों की मौत, लाखों लोगों का विस्थापन, आवासीय क्षेत्रों और बुनियादी ढांचे की व्यापक तबाही तथा मानवीय संकट ने इस्राईल के ख़िलाफ़ अंतरराष्ट्रीय आक्रोश को और गहरा कर दिया है।

इस्राईल की सैन्य कार्रवाइयों के कारण अस्पतालों, स्कूलों, आवासीय इलाकों और नागरिक सुविधाओं के विनाश की खबरों ने भी दुनिया भर में सवाल खड़े किए हैं। फ़िलिस्तीनी नागरिकों की भारी कीमत पर हासिल की जा रही सैन्य बढ़त को लेकर मानवाधिकार संगठनों और कई देशों में तीखी आलोचना हुई है। परिणामस्वरूप, जिस इस्राईल को लंबे समय तक पश्चिमी देशों के मजबूत समर्थन का भरोसा था, उसे अब पहले की तुलना में कहीं अधिक राजनीतिक और कूटनीतिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है।

इस्राईल की नीतियों के खिलाफ वैश्विक विरोध केवल अरब और मुस्लिम देशों तक सीमित नहीं रहा है। यूरोप और दुनिया के अन्य हिस्सों में भी फ़िलिस्तीन के समर्थन में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए हैं। कई देशों ने इस्राईल की सैन्य कार्रवाइयों पर चिंता जताई है और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसके खिलाफ आवाज़ तेज हुई है। इससे यह संकेत मिलता है कि लगातार सैन्य शक्ति के इस्तेमाल और फ़िलिस्तीनी नागरिकों के खिलाफ कठोर नीतियों के सहारे अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता बनाए रखना इस्राईल के लिए लगातार कठिन होता जा रहा है।

बेंट का बयान इस्राईली नेतृत्व के भीतर बढ़ती राजनीतिक और रणनीतिक चिंता को भी उजागर करता है। एक ओर नेतन्याहू सरकार सैन्य कार्रवाई को अपनी सुरक्षा नीति का आधार बनाए हुए है, वहीं दूसरी ओर उसके कारण इस्राईल को बढ़ते अंतरराष्ट्रीय विरोध, कूटनीतिक दबाव और राजनीतिक अलगाव का सामना करना पड़ रहा है।

इस प्रकार नफ्ताली बेंट की टिप्पणी को इस्राईल की मौजूदा नीतियों की एक महत्वपूर्ण आंतरिक स्वीकारोक्ति के रूप में देखा जा सकता है। ग़ज़ा में तबाही और लगातार सैन्य कार्रवाइयों के कारण इस्राईल ने न केवल फ़िलिस्तीनी जनता के बीच बल्कि दुनिया के अनेक हिस्सों में भी अपने प्रति गहरा अविश्वास और आक्रोश पैदा किया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ता अलगाव इस्राईल के लिए केवल कूटनीतिक समस्या नहीं, बल्कि उसकी वर्तमान नीतियों की गंभीर राजनीतिक कीमत का संकेत भी है।

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