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तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब के सैन्य कमांडरों की आपात बैठक

तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब के सैन्य कमांडरों की आपात बैठक

सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के सैन्य कमांडरों की मौजूदगी में एक बैठक आयोजित की जाएगी, जिसमें तीनों देशों के बीच हुए संयुक्त रक्षा समझौते के तहत सऊदी अरब को समर्थन देने के मुद्दे पर चर्चा होगी।

हालांकि, इस घटनाक्रम को यमन में पिछले कई वर्षों से चले आ रहे संघर्ष की पृष्ठभूमि में देखना जरूरी है। सऊदी अरब लंबे समय से यमन के मामले में सैन्य हस्तक्षेप करता रहा है और यमन के खिलाफ सैन्य अभियानों में उसकी प्रमुख भूमिका रही है। इसके साथ ही यमन पर लगाए गए प्रतिबंधों और नाकाबंदी को लेकर भी लगातार विवाद रहा है। अंसारुल्लाह का कहना है कि यमन पर सैन्य और आर्थिक दबाव डालने के बाद केवल सऊदी अरब के “आत्मरक्षा के अधिकार” की बात करना संघर्ष की पूरी पृष्ठभूमि को नजरअंदाज करना है।

अंसारुल्लाह ने अपने बयानों में स्पष्ट किया है कि यमन पर होने वाली सैन्य कार्रवाई का जवाब दिया जाएगा। यमनी पक्ष का घोषित रुख यह रहा है कि “हमलों का जवाब हमलों से और नाकाबंदी का जवाब नाकाबंदी से दिया जाएगा।” अंसारुल्लाह इस नीति को सऊदी और उसके सहयोगियों द्वारा यमन पर लगाए गए सैन्य तथा आर्थिक दबाव की प्रतिक्रिया के रूप में प्रस्तुत करता है।

इसी संदर्भ में सऊदी अरब द्वारा अब दूसरे देशों से अपनी सुरक्षा के लिए सहयोग मांगना भी यमन संघर्ष के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है। यमनी पक्ष का तर्क है कि यदि सऊदी अरब और उसके सहयोगी यमन के खिलाफ सैन्य दबाव जारी रखते हैं, तो यमन भी अपनी सैन्य क्षमताओं का इस्तेमाल जवाबी कार्रवाई के लिए करेगा।

यह बैठक ऐसे समय में हो रही है, जब कई विश्लेषक तीनों देशों के बीच “मक्का समझौते” के नाम से जाने जाने वाले सैन्य समझौते के वास्तविक रूप से लागू होने और उसके क्रियान्वयन को लेकर संदेह व्यक्त कर रहे हैं।

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