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ईरान के ख़िलाफ़ छेड़ी गई युद्ध की आग, यूरोप की सड़कों तक पहुँची

ईरान के ख़िलाफ़ छेड़ी गई युद्ध की आग, यूरोप की सड़कों तक पहुँची

यूरोप में गैस की कीमतों में 140 प्रतिशत की वृद्धि और डीज़ल की कीमतों के दोगुना होने का असर उस कीमत का महज़ एक छोटा-सा हिस्सा है, जो यूरोपीय देशों के लोग अमेरिका द्वारा ईरान के खिलाफ छेड़े गए युद्ध के कारण चुका रहे हैं। इन आर्थिक दबावों ने अब यूरोप में जनता के विरोध प्रदर्शनों को और भड़का दिया है तथा यूरोपीय सरकारों को व्यापक और लगातार जारी प्रदर्शनों का सामना करना पड़ रहा है।

डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के ख़िलाफ़ युद्ध शुरू करके न केवल अपने देश के लोगों को दबाव में डाला, बल्कि यूरोप के लोगों को भी इस दलदल में धकेल दिया। अब रॉयटर्स समेत अमेरिका के कई प्रमुख मीडिया संस्थान और अनेक विशेषज्ञ स्वीकार कर रहे हैं कि ईरान के खिलाफ युद्ध के कारण ईंधन की कीमतों में हुई वृद्धि ने यूरोप में विरोध प्रदर्शनों की लहर को तेज़ कर दिया है।

यूरोप भर में व्यापक विरोध प्रदर्शनों के बीच रॉयटर्स ने लिखा है कि ईंधन की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि ने पूरे यूरोप में परिवारों के बजट और कारोबारों पर दबाव बढ़ा दिया है। जीवन-यापन की लागत में वृद्धि से पैदा हुए इन दबावों ने सामाजिक असंतोष को और गहरा कर दिया है।

युद्ध के शुरुआती दिनों में, जब अमेरिका ने ईरान के ख़िलाफ़ युद्ध शुरू किया और होर्मुज़ जलडमरूमध्य बंद हो गया, तब यूरोपीय अधिकारी ईरान की जवाबी कार्रवाइयों के प्रभाव को कम करके दिखाने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन अब, ईरान के ख़िलाफ़ युद्ध शुरू होने के लगभग आठ महीने बाद, उनके पास होर्मुज़ जलडमरूमध्य के बंद होने और अमेरिका की युद्ध भड़काने वाली कार्रवाइयों के प्रभावों को स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है।

यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने 16 अक्टूबर को यूरोपीय संघ के नेताओं के शिखर सम्मेलन के बाद आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में खुले तौर पर कहा कि फरवरी के अंत से—यानी अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध शुरू होने के बाद से—गैस की क़ीमतों में लगभग 140 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और डीज़ल की कीमतें दोगुनी हो गई हैं।

फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने भी अपने देश में व्यापक विरोध प्रदर्शनों के बाद स्वीकार किया कि ईंधन की कीमतों में वृद्धि के कारण लोगों में असंतोष बढ़ा है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि “फ़ारस की खाड़ी में हुई घटनाओं” ने आर्थिक दबाव और ईंधन की क़ीमतों में वृद्धि को बढ़ावा दिया है।

मैक्रों ने भी अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार किया कि यूरोप उस युद्ध की क़ीमत चुका रहा है, जिसे अमेरिका ने शुरू किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि, ईंधन की क़ीमतों में वृद्धि ऐसे युद्ध के कारण हुई है, “जिसका फ़्रांस हिस्सा नहीं था” और जिसमें उसकी कोई भूमिका नहीं थी। इससे पहले, लगभग एक महीने पूर्व, मैक्रों ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य के बंद रहने के महत्व को स्वीकार करते हुए कहा था कि “हम होर्मुज़ जलडमरूमध्य के बंद होने के परिणामों के साथ जी रहे हैं।”

यूरोप की जनता का असंतोष सड़कों पर उमड़ा

पश्चिमी मीडिया ने यूरोप में व्यापक विरोध प्रदर्शनों का उल्लेख करते हुए अमेरिका द्वारा ईरान के ख़िलाफ़ छेड़े गए युद्ध को जनता के बढ़ते असंतोष और प्रदर्शनों के प्रमुख कारणों में से एक बताया है। इन मीडिया संस्थानों ने कहा है कि इस युद्ध के कारण ऊर्जा की कीमतें बढ़ गई हैं और सरकारों को महँगाई पर काबू पाने तथा जीवन-यापन की लागत को नियंत्रित करने के लिए “कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है।”

फ़्रांस में विरोध प्रदर्शनों की लहर की शुरुआत स्कूली विद्यार्थियों से हुई, लेकिन बहुत कम समय में समाज के अन्य वर्ग भी इसमें शामिल हो गए। मीडिया ने लाखों की संख्या के बजाय सैकड़ों हज़ार लोगों की भागीदारी वाले इन प्रदर्शनों को हाल के वर्षों में फ़्रांस के “सबसे बड़े और सबसे गंभीर” विरोध प्रदर्शनों में से एक बताया है।

फ़्रांस के लोगों के साक्षात्कार उनकी आर्थिक माँगों को स्पष्ट रूप से सामने लाते हैं। प्रदर्शनकारियों में से एक 21 वर्षीय युवा क्वेंटिन लुइलो हैं। रॉयटर्स के साथ एक साक्षात्कार में, जब उनसे पूछा गया कि वह विरोध प्रदर्शन में क्यों शामिल हुए, तो उन्होंने कहा:

“मैं यहाँ क्यों हूँ? देखिए, यह बहुत सीधी-सी बात है। मुझे लगता है कि मौजूदा जीवन-यापन की लागत वास्तव में भयावह है।”

उन्होंने आगे कहा:

“ज़रा उन लोगों के बारे में सोचिए, जिन्हें बड़ी मुश्किल से न्यूनतम वेतन मिलता है। खाने-पीने की चीज़ों, ईंधन और हर दूसरी चीज़ की कीमतों को देखिए। हर चीज़ का इतना ज़्यादा महँगा हो जाना भयावह है।”

इटली और पुर्तगाल समेत अन्य यूरोपीय देशों के लोग भी इसी तरह की समस्याओं का सामना कर रहे हैं। वे भी “जीवन-यापन की बढ़ती लागत” और “आवास संकट” के विरोध में सड़कों पर उतर आए हैं। यूरोपीय आयोग ने अनुमान लगाया है कि, ईरान के ख़िलाफ़ युद्ध के कारण व्यापार और ऊर्जा बाज़ारों में व्यवधान पैदा हुआ है, जिससे यूरोप को लगभग 100 अरब यूरो (112 अरब डॉलर) का नुक़सान हुआ है।

अमेरिका की युद्ध भड़काने वाली नीतियों की क़ीमत अब यूरोपीय देशों के लिए इस अनुमान से भी आगे बढ़ चुकी है। इसमें प्रदर्शनकारियों से निपटने तथा क्षतिग्रस्त शहरों और स्थानों के पुनर्निर्माण पर होने वाले खर्च भी शामिल हैं। यूरोप एक बार फिर ऐसे अमेरिका की कार्रवाइयों की क़ीमत चुका रहा है, जो अहम मौकों पर अपने सहयोगियों का साथ छोड़ देता है और जिस पर किसी भी तरह भरोसा नहीं किया जा सकता।

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