यूरोप की गोपनीय स्वीकारोक्ति: इज़रायल एक रंगभेदी (अपार्थाइड) शासन है
यूरोपीय संघ एक बार फिर अपने कथनी और करनी के अंतर को लेकर सवालों के घेरे में है। यूरोपीय समाचार मंच Euractiv की रिपोर्ट के अनुसार, यूरोपीय संघ की विदेश नीति प्रमुख काजा कालास ने एक गोपनीय बैठक में फ़िलिस्तीनियों के प्रति इज़रायल के व्यवहार की तुलना दक्षिण अफ्रीका के कुख्यात अपार्थाइड शासन से की। यह स्वीकारोक्ति ऐसे समय में सामने आई है जब ग़ाज़ा में महीनों से जारी युद्ध, व्यापक विनाश और मानवीय संकट को लेकर दुनिया भर में चिंताएँ व्यक्त की जा रही हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, कालास ने दक्षिण अफ्रीका के अपार्थाइड संग्रहालय की अपनी यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि ग़ाज़ा और वेस्ट बैंक में लागू नीतियाँ उन्हें उस नस्लीय भेदभावपूर्ण व्यवस्था की याद दिलाती हैं जिसने दशकों तक दक्षिण अफ्रीका में अश्वेत आबादी को उनके बुनियादी अधिकारों से वंचित रखा था।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि यूरोपीय संघ के शीर्ष अधिकारी निजी बैठकों में इज़रायल की नीतियों को अपार्थाइड के समान मानते हैं, तो सार्वजनिक मंचों पर वही यूरोपीय संघ इस शब्द के प्रयोग से क्यों बचता है? मानवाधिकारों, लोकतंत्र और अंतरराष्ट्रीय कानून की दुहाई देने वाला यूरोप, इज़रायल के मामले में अलग मापदंड अपनाता दिखाई देता है।
आलोचकों का कहना है कि यूरोपीय संघ ने रूस सहित कई देशों पर मानवाधिकार उल्लंघनों के आरोपों के आधार पर कठोर प्रतिबंध लगाए हैं, लेकिन फ़िलिस्तीन के प्रश्न पर उसकी नीति नरम और निष्क्रिय रही है। यही कारण है कि यूरोप पर दोहरे मानदंड अपनाने के आरोप लगातार बढ़ते जा रहे हैं।
इस खुलासे ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि क्या यूरोप वास्तव में मानवाधिकारों के सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्ध है, या फिर उसके निर्णय राजनीतिक और रणनीतिक हितों से संचालित होते हैं। यदि निजी बैठकों में इज़रायल की नीतियों को अपार्थाइड माना जा रहा है, तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय यह पूछने का अधिकार रखता है कि इस स्वीकारोक्ति के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही।

