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ईरान युद्ध से बाहर निकलने का रास्ता ट्रंप के लिए जोखिम भरा है

ईरान युद्ध से बाहर निकलने का रास्ता ट्रंप के लिए जोखिम भरा है

मध्य पूर्व शांति वार्ताओं के पूर्व अमेरिकी वार्ताकार आरोन डेविड मिलर का कहना है कि, “जो स्थिति कभी पूरी तरह अमेरिका के पक्ष में और बिना किसी बाधा के थी, अब वैसी नहीं रही। और ऐसा लगभग कुछ भी नहीं है जिसे ट्रंप ईरान के साथ होने वाले किसी ऐसे समझौते से हासिल कर सकें, जिसे ईरान स्वीकार करने को तैयार हो, और जिससे यह वास्तविकता बदल जाए।”

फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, डोनाल्ड ट्रंप ने कभी ईरान को परमाणु शक्ति बनने से रोकने के वादे के साथ इस देश पर हमला किया था, लेकिन अब उन्हें ईरान के साथ बातचीत की मेज पर आना पड़ रहा है। दूसरी ओर, ईरान जब चाहे तब होर्मुज़ जलडमरूमध्य को बंद कर सकता है। यह स्थिति ट्रंप की उस “बिना शर्त आत्मसमर्पण” वाली नीति से बिल्कुल अलग है, जिसकी उन्होंने बात की थी।

मिलर ने कहा, “फिलहाल मुझे ऐसा कोई रास्ता नहीं दिखता, जिससे दोनों पक्षों के हितों में संतुलन बने और ट्रंप प्रशासन इस पूरे घटनाक्रम से ऐसी उपलब्धि के साथ बाहर निकले, जिसे आम लोग वास्तविक जीत मानें।”

ब्रिटिश अखबार के अनुसार, इस महंगे युद्ध से बाहर निकलने का हर रास्ता ट्रंप के लिए राजनीतिक रूप से बेहद जोखिम भरा हो गया है।

इस युद्ध ने तेल की संभावित कमी और महंगाई को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं। खासकर तब, जब अमेरिकी कांग्रेस के मध्यावधि चुनाव में अब तीन महीने से भी कम समय बचा है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि ईरान के साथ युद्ध के अमेरिका पर नकारात्मक प्रभाव भी स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं। युद्ध समाप्त होने की उम्मीदों के बीच वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमत घटकर 80 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गई है, लेकिन अमेरिका में पेट्रोल की कीमत अब भी 4 डॉलर प्रति गैलन से अधिक है, जो युद्ध शुरू होने से पहले की तुलना में लगभग 35 प्रतिशत ज्यादा है। वहीं डीज़ल की कीमत ट्रंप के कार्यकाल में अब जो बाइडन के समय के औसत स्तर से भी ऊपर पहुंच गई है।

रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका के इंटरसेप्टर मिसाइलों के भंडार में कमी आई है, जबकि अमेरिकी जनता और उसके सहयोगी देश भी इस युद्ध से थक चुके हैं।

जो बाइडन प्रशासन में सऊदी अरब में अमेरिका के पूर्व राजदूत माइकल रैटनी का कहना है कि इस स्थिति ने राष्ट्रपति ट्रंप को “सीमित विकल्पों” के सामने खड़ा कर दिया है।

रैटनी ने कहा, “यदि तनाव और बढ़ता है तो क्षेत्रीय देशों को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है, तेल की कीमतों में और वृद्धि होगी तथा वैश्विक ऊर्जा बाजार को भी भारी झटका लगेगा।”

हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि ऐसा कोई समझौता, जिसमें ईरान को किसी हद तक नियंत्रण बनाए रखने की अनुमति दी जाए, खाड़ी क्षेत्र के अमेरिकी सहयोगियों से लेकर अमेरिकी करदाताओं तक किसी के लिए भी स्वीकार्य नहीं होगा।

रैटनी के अनुसार, “ट्रंप के सामने चुनौती सिर्फ यह नहीं है कि युद्ध को आगे कैसे बढ़ाया जाए, बल्कि यह भी है कि ऐसे किसी समझौते को अमेरिकी जनता के सामने किस तरह उचित और सफल बताया जाए।” उन्होंने कहा कि किसी भी समझौते को सफल साबित करना “हर गुजरते दिन के साथ और अधिक कठिन होता जा रहा है।”

फिलहाल सारी उम्मीदें होर्मुज़ जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने पर टिकी हैं। युद्ध से पहले दुनिया के लगभग पांचवें हिस्से का तेल इसी समुद्री मार्ग से गुजरता था, लेकिन अब यही इलाका संघर्ष का प्रमुख केंद्र बन चुका है। हाल के सप्ताहों में ईरान और ओमान के बीच हुई प्रत्यक्ष वार्ताओं का मुख्य विषय भी यही जलडमरूमध्य रहा है।

अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने मंगलवार को सीएनबीसी से कहा कि यदि ईरान “आज या कल” भी जलडमरूमध्य खोलने पर सहमत हो जाए, तब भी विश्लेषकों के अनुसार युद्ध से पहले जैसी पूरी समुद्री आवाजाही की स्वतंत्रता तुरंत बहाल नहीं हो सकेगी।

ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माईल बकाई ने मंगलवार को कहा कि ईरान और ओमान जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही के भविष्य के प्रबंधन के लिए नए प्रोटोकॉल तैयार कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि कोई भी व्यवस्था फिलहाल अस्थायी होगी और अंतिम समझौते तक पहुंचने के लिए वार्ताएं जारी रहने तक आने-जाने वाले समुद्री मार्गों को कवर करेगी।

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