दुश्मन हार चुका है और उसे अपमान के साथ क्षेत्र छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा: हबीबुल्लाह सय्यारी
ईरान की सेना के समन्वय मामलों के उप-प्रमुख रियर एडमिरल हबीबुल्लाह सय्यारी ने कहा है कि देश के दुश्मन अपने सैन्य और राजनीतिक उद्देश्यों को हासिल करने में नाकाम रहे और उन्हें क्षेत्र से पीछे हटना पड़ा। तेहरान में सेना के गैर-कमीशन अधिकारी कैडेटों के 11वें संयुक्त प्रारंभिक युद्ध प्रशिक्षण पाठ्यक्रम के समापन समारोह में बोलते हुए सय्यारी ने शहीदों को श्रद्धांजलि दी। उन्होंने नए सैन्य जवानों से ईरान की क्षेत्रीय अखंडता, स्वतंत्रता और इस्लामी गणराज्य की व्यवस्था की रक्षा करने की जिम्मेदारी निभाने को कहा।
सय्यारी के मुताबिक, ईरानी सेना के तीन मुख्य उद्देश्य हैं—
देश की सीमाओं और क्षेत्र की रक्षा करना,
राष्ट्रीय स्वतंत्रता की रक्षा करना
और इस्लामी गणराज्य की व्यवस्था की रक्षा करना।
उन्होंने कहा कि, आज के समय में युद्ध का तरीक़ा तेज़ी से बदल रहा है। इसलिए सैनिकों को केवल पारंपरिक सैन्य प्रशिक्षण तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उन्हें विज्ञान, तकनीक, सूचना, संचार, आधुनिक हथियारों और नए युद्धकौशल की जानकारी भी हासिल करनी चाहिए। उन्होंने सैनिकों के लिए अनुशासन, साहस, आत्मविश्वास, रचनात्मक सोच, पहल और मजबूत मनोबल को भी जरूरी बताया।
ईरान–इराक़ युद्ध का किया जिक्र
सय्यारी ने 1980 से 1988 के बीच हुए ईरान-इराक़ युद्ध को याद करते हुए कहा कि उस समय इराकी शासन का लक्ष्य ईरानी इस्लामी क्रांति को कमजोर करना और खुज़ेस्तान पर क़ब्ज़ा करना था। उन्होंने कहा कि इराक़ी सेना की योजना जल्द ही ख़ुर्रमशहर और अबादान पर क़ब्ज़ा करने और बाद में तेहरान की ओर बढ़ने की थी।
सय्यारी के अनुसार, ईरानी सेना और आम लोगों के कड़े विरोध के कारण इराक़ी सीन की यह योजना सफल नहीं हो सकी।
उन्होंने युद्ध के शुरुआती दौर में ईरानी वायु सेना की कार्रवाई और ‘ऑपरेशन कमान-99’ का भी जिक्र किया। इसके अलावा उन्होंने अबादान की घेराबंदी खत्म करने तथा ‘फत्हुल-मोबीन’ और ‘बैत-उल-मुकद्दस’ जैसे सैन्य अभियानों में ईरानी सेना की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया।
सय्यारी ने दावा किया कि ‘बैत-उल-मुकद्दस’ अभियान के दौरान करीब 20 हजार इराकी सैनिकों को बंदी बनाया गया, जबकि 17 से 18 हजार सैनिक मारे गए। उनके अनुसार, इस अभियान में क़रीब 6 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को वापस हासिल किया गया।
नौसेना की भूमिका का उल्लेख
सय्यारी ने ईरानी नौसेना की भूमिका का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि 1980 में ‘ऑपरेशन मरोरिड’ के दौरान ईरानी नौसेना ने इराक़ी नौसेना को बड़ा नुक़सान पहुंचाया। इस दौरान अल-बकर और अल-अमिया के तेल प्रतिष्ठानों को भी निशाना बनाया गया।
उन्होंने युद्ध के दौरान ईरान की वायु रक्षा व्यवस्था का जिक्र करते हुए दुश्मन के कई विमानों को मार गिराने के ईरानी दावों को भी सामने रखा।
सेना और जनता के रिश्ते पर ज़ोर
सय्यारी ने कहा कि ईरान के लिए सेना और जनता एक-दूसरे का सहारा हैं। उन्होंने इसे इस तरह बताया कि “सेना राष्ट्र के लिए बलिदान है और राष्ट्र सेना का सहारा है।” उन्होंने कहा कि, ईरान-इराक़ युद्ध के दौरान आम लोगों के समर्थन और उनकी भागीदारी ने देश के प्रतिरोध को मज़बूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
हाल के 12-दिवसीय युद्ध का भी जिक्र
अपने भाषण के अंत में सय्यारी ने हाल के “12-दिवसीय युद्ध” और “रमज़ान युद्ध” का भी उल्लेख किया। उन्होंने दावा किया कि, इन संघर्षों में दुश्मन का उद्देश्य ईरान की क्षेत्रीय अखंडता और इस्लामी गणराज्य की व्यवस्था को नुकसान पहुंचाना था।
सय्यारी के अनुसार, दुश्मन अपने उद्देश्यों को हासिल नहीं कर सका और उसे विफलता के बाद क्षेत्र छोड़ना पड़ा। उन्होंने इसके लिए ईरानी सशस्त्र बलों के प्रतिरोध, जनता के समर्थन, धैर्य और देश की विभिन्न सुरक्षा एवं सैन्य संस्थाओं के बीच एकता को जिम्मेदार बताया।

