सऊदी अरब सैनिक में भेजना, ईरान के साथ युद्ध में शामिल होने जैसा है: फ्रांस के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार
फ्रांस के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार और ‘ला फ्रांस इंशुमीज़’ पार्टी के नेता ज्यां-ल्यूक मेलांकों ने राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के सऊदी अरब में फ्रांसीसी सैनिक और सैन्य उपकरण भेजने के फैसले का विरोध किया है। उन्होंने चेतावनी दी कि यह क़दम फ्रांस को अप्रत्यक्ष रूप से ईरान के साथ युद्ध में धकेल सकता है।
मैक्रों ने हाल ही में फ्रांसीसी टेलीविजन को दिए एक साक्षात्कार में कहा था कि, फ्रांस सऊदी अरब के लाल सागर तट पर स्थित रणनीतिक बंदरगाह शहर यन्बू की सुरक्षा में मदद के लिए सैनिकों, रडार और रक्षा प्रणालियों को तैनात करेगा। उन्होंने स्पष्ट किया था कि इसका उद्देश्य किसी संघर्ष में शामिल होना नहीं, बल्कि महत्वपूर्ण तेल निर्यात स्थल की सुरक्षा करना है।
हालांकि, मेलांकों ने सरकार के इस तर्क पर सवाल उठाते हुए कहा कि, सऊदी अरब और उसके आसपास के सैन्य ठिकाने पहले ही हमलों का सामना कर चुके हैं। ऐसे में फ्रांसीसी सैनिकों की तैनाती उन्हें संभावित युद्ध की स्थिति में ला सकती है।
मेलांकों ने कहा कि यदि वहां तैनात फ्रांसीसी सैनिकों पर हमला होता है, तो जवाबी कार्रवाई की स्थिति पैदा हो सकती है। उनके मुताबिक, ऐसी परिस्थितियों में फ्रांस चाहे जितना भी यह कहे कि, वह युद्ध में शामिल नहीं है, वह वास्तविक रूप से एक शत्रुतापूर्ण स्थिति का हिस्सा बन सकता है।
उन्होंने फ्रांसीसी संविधान के अनुच्छेद 35 का हवाला देते हुए मांग की कि सऊदी अरब में सैनिकों और सैन्य संसाधनों की तैनाती के मुद्दे पर संसद में चर्चा और मतदान कराया जाए। उन्होंने कहा कि प्रथम खाड़ी युद्ध के दौरान भी फ्रांसीसी सैन्य हस्तक्षेप को लेकर संसद में मतदान हुआ था।
मेलांकों ने यह भी सवाल उठाया कि, सऊदी अरब में फ्रांसीसी सैनिकों के साथ किस प्रकार के सैन्य उपकरण भेजे जाएंगे। उन्होंने मिसाइलों और वायु रक्षा प्रणालियों की संभावित तैनाती का उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि यह केवल सैन्य उपकरण भेजने का मामूली मामला नहीं, बल्कि ऐसी स्थिति है जिसमें फ्रांस किसी बड़े क्षेत्रीय संघर्ष में शामिल हो सकता है। मेलांकों ने विशेष रूप से कहा कि “सऊदी अरब में युद्ध में जाना, ईरान के साथ युद्ध में जाने के बराबर है।”
उन्होंने अमेरिका और ईरान के बीच संभावित संघर्ष में फ्रांस के शामिल होने का भी विरोध किया और कहा कि ऐसे युद्ध के लिए कोई अंतरराष्ट्रीय जनादेश नहीं है। उन्होंने सरकार से इस मुद्दे पर संसद में गंभीर चर्चा कराने की मांग की।

