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क्षेत्र में तनाव कम करने के लिए क़तर की जॉर्डन, ओमान और सऊदी अरब से बातचीत

क्षेत्र में तनाव कम करने के लिए क़तर की जॉर्डन, ओमान और सऊदी अरब से बातचीत

क़तर के विदेश मंत्री ने रविवार शाम जॉर्डन, ओमान और सऊदी अरब के अपने समकक्षों से क्षेत्रीय तनाव पर टेलीफोन पर बातचीत की। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, इन वार्ताओं में ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम करने तथा क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने पर चर्चा हुई।

हालाँकि, इस पहल को लेकर कई राजनीतिक विश्लेषकों और आलोचकों ने गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि शांति की अपील करने वाले यही देश पहले अमेरिका की क्षेत्रीय सैन्य रणनीति का हिस्सा बने रहे हैं। आलोचकों के अनुसार, यदि क़तर, जॉर्डन,और सऊदी अरब वास्तव में युद्ध टालना चाहते थे, तो उन्हें अमेरिका को अपनी ज़मीन, सैन्य अड्डों, हवाई क्षेत्र और रसद सुविधाओं का उपयोग ईरान के विरुद्ध सैन्य अभियानों के लिए नहीं करने देना चाहिए था।

विश्लेषकों का कहना है कि एक ओर ये देश क्षेत्र में शांति और तनाव कम करने की बातें करते हैं, जबकि दूसरी ओर उनकी नीतियाँ अमेरिकी सैन्य अभियानों को सुविधाजनक बनाती हैं। उनके अनुसार, इस तरह का दोहरा रवैया क्षेत्रीय देशों के बीच अविश्वास को और बढ़ाता है।

आलोचकों का यह भी आरोप है कि क़तर, जॉर्डन, यूएई और सऊदी अरब ने अमेरिका और इस्राईल की सैन्य कार्रवाइयों पर खुलकर सवाल उठाने से परहेज़ किया और केवल ईरान से संयम बरतने तथा समझौतों के पालन की अपेक्षा दोहराई। उनके अनुसार, यह संतुलित कूटनीति नहीं बल्कि एकतरफ़ा राजनीतिक रुख़ का संकेत देता है।

विश्लेषकों का कहना है कि यदि इन देशों की प्राथमिकता वास्तव में शांति होती, तो वे अपनी धरती और संसाधनों का उपयोग किसी भी सैन्य हमले के लिए नहीं होने देते। उनका तर्क है कि युद्ध के दौरान किसी पक्ष को सैन्य सुविधाएँ उपलब्ध कराना और बाद में शांति की अपील करना, दोनों बातें एक-दूसरे के विपरीत प्रतीत होती हैं।

आलोचकों के अनुसार, क्षेत्र में स्थायी शांति तभी संभव है जब सभी पक्षों के प्रति समान मानदंड अपनाए जाएँ और किसी भी देश की सैन्य कार्रवाई या बाहरी हस्तक्षेप को बिना भेदभाव के चुनौती दी जाए। उनका मानना है कि केवल बयान जारी करने से नहीं, बल्कि व्यावहारिक और निष्पक्ष नीतियाँ अपनाने से ही पश्चिम एशिया में स्थायी शांति का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।

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